किताबें केवल उत्तर नहीं,
कभी प्रश्न भी देती हैं,
मौन पृष्ठों के भीतर
जीवन की राहें देती हैं।
कथा वही, शब्द वही,
पर अर्थ बदलता जाता है,
पाठक जब बदलता है,
साहित्य नया हो जाता है।
भाषा केवल शब्द नहीं,
माँ की पहली पुकार है,
पीढ़ियों की स्मृति और
संस्कृति का आधार है।
हिन्दी हो या कोंकणी,
हर भाषा में देश बसे,
भिन्न स्वरों में मिलकर
भारत के सपने हँसे।
भाषा को केवल बचाना नहीं,
जीवन में उसको जीना है,
पुरखों से मिले शब्दों को
अगली पीढ़ी तक देना है।
साहित्य वही जो मनुष्य को
मनुष्य के निकट लाए,
एक हृदय की अनुभूति
दूजे हृदय तक पहुँचाए।
उत्तर मिले या न मिले,
प्रश्नों का दीप जलता रहे;
शब्दों की यह यात्रा
पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहे।
-डी के कनौजिया