विज्ञापन

लोकतंत्र

Adarsh Upadhyay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लोकतंत्र की मर्यादाओ को तार तार पाकर,
        
                                                    
                            
कुंठित होकर कुपित होकर खुद टूट गए विद्यासागर,

ना पद की गरीमा ना संविधान का लाज बचा
आगे बढ़ते भारतवर्ष मे निरंकुशता का आगाज हुआ


नए नए भारत मे खुद को ठगा हुआ पाकर
कुंठित होकर कुपित होकर टूट गए विद्यासागर



नहीं बचा अब शेष यहां अनपढ़ कुपढो की लड़ाई थी
तोड़ दिया उस प्रतिमा को जिसने ज्ञानदीप जलाई थी
(आदर्श उपाध्याय) 



 हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all