लोकतंत्र की मर्यादाओ को तार तार पाकर,
कुंठित होकर कुपित होकर खुद टूट गए विद्यासागर,
ना पद की गरीमा ना संविधान का लाज बचा
आगे बढ़ते भारतवर्ष मे निरंकुशता का आगाज हुआ
नए नए भारत मे खुद को ठगा हुआ पाकर
कुंठित होकर कुपित होकर टूट गए विद्यासागर
नहीं बचा अब शेष यहां अनपढ़ कुपढो की लड़ाई थी
तोड़ दिया उस प्रतिमा को जिसने ज्ञानदीप जलाई थी
(आदर्श उपाध्याय)
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