घूम रहा मन,
मानो श्रृंगार से तृप्त,
इस के मनोबल से,
नए अंकुर को जन्म दिया,
नाम कहें जिसका — नवजीवन।
भोर के अंधियारे में,
पायल की आहट पर,
नींद को छोड़कर लक्ष्य हो प्राप्त,
व्याकुलता से हृदय कहता है —
स्कूल भी जाना है।
धुंध घिर के अंतर को तृप्त करे,
ओट में नींद बढ़ती जाती है,
करुणा की घटना हो सुबह,
हित से कार्य, अंत ही सीख दे रही।
सूरज की लालिमा की प्रीत को,
किवाड़ के पर्दे यह बनी,
स्नेह की माला समझ रहे,
सौंदर्य को आमंत्रित कर।
व्याख्या कर रहा सूरज,
उठो — खोलो नींद को,
मंज़िल बाकी है,
मंज़िल,
कोई और न ले जाए तुम्हारे हक का प्रीत।
गर्मी की ज्यादा हवस नहीं,
ठंडी का रोना नहीं,
वर्षा भी जीवन में कम नहीं,
भूल जाए वक्त,
हमें मंजूर,
पर हम न भूल जाएँ वक्त को।
वर्षा की,
गर्मी की,
ठंडी की,
मन भी हतप्रभ है,
कभी - कभी।