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तुम ही राह दिखाओ इस अनजान बादल में

Abhishek Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत जल्दी है तुमको,
        
                                                    
                            
क्या अभी मेरा वक़्त ख़त्म करोगे?

इतना न तड़पाओ मुझे,
क्या जीवन की अभिलाषा का अंत करोगे?

मैं हर एक पंक्ति का उदाहरण लेकर कब तक यूँ ही फिरता रहूँ,
तुम सुनो तो ज़रा,
मैं ,
तुम्हारी हर एक परिभाषा का उत्तर देता रहूँ।

क्या अब भी मैं शांत,
मौन होकर तुम्हें बस निहारता रहूँ?

या बेफ़िक्र होकर इन घने बादलों में,
खुद को विचारता रहूँ?

इस अंधियारी रात की खातिर,
न जाने क्या-क्या कहना छोड़ दिया,
मंथन के इस उथल-पुथल में,
मैंने खुद को उलझाना छोड़ दिया।

अब धीरे से खुद ही,
मैं इस 'सितम' की परिभाषा देने लगा हूँ,
अत्याचार को भूलकर,
बस उसकी यादों के साए में जीने लगा हूँ।

अपनी इस बेफ़िक्र,
नादान पसंद को विचारों में शांत होने दिया,
रहस्यों में ऐसा उलझा कि खुद को करवटें बदलते ही पाया।

यह दुनिया क्या जाने कि मैं किस कदर बेफ़िक्र हुआ हूँ,
हँसती है तो हँसने दे इस दुनिया को,
अगर मैं ज़रा सा फिसला हूँ।

अब तुम ही बताओ,
कहाँ चलूँ मैं?

मेरा अधिकार क्या है?

क्या बेरंग हुई इस रात में,
तेरे पास मेरे हक का कोई लिखा है?

यूँ ही बेफ़िक्र होकर,
अब मैं कहाँ जाऊँ और क्या ढूँढूँ?

तुम ही राह दिखाओ इस अनजान बादल में,
अब मैं क्या करूँ?
3 घंटे पहले
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