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विश्व संगीत दिवस- किसी संगीत से कम नहीं है इन कविताओं की लय

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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विश्व संगीत दिवस की शुरुआत फ़ांस से हुई थी और यह धीरे-धीरे पूरे विश्व में मशहूर हो गया। संगीत वही है जिसमें लय हो, इस तर्ज पर कविताएं भी संगीत से कम नहीं होतीं। उनमें लय है, शब्दों के आरोह-अवरोह हैं और गायन भी है। ऐसी ही कुछ चुनिंदा कविताएं जिन्हें पढ़ते वक़्त किसी संगीत की ही अनुभूति होती है।

महादेवी वर्मा 

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

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समर शेष है / रामधारी सिंह "दिनकर"

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो 
किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान 

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले 
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है 

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार 

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है 
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है 
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है 
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है 

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज 
सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज? 

नर हो, न निराश करो मन को / मैथिलीशरण गुप्त

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।

जो बीत गई सो बात गयी / हरिवंशराय बच्चन

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई

सखि, वसन्त आया / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

सखि वसन्त आया 
भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया 
किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका
मधुप-वृन्द बन्दी
पिक-स्वर नभ सरसाया 

लता-मुकुल-हार-गंध-भार भर
बही पवन बंद मंद मंदतर
जागी नयनों में वन
यौवन की माया 
आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे
केशर के केश कली के छुटे
स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया 


साभार - कविताकोश 
7 वर्ष पहले
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