अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर
वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए
- सज्जाद बाक़र रिज़वी
हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा
- बशीर बद्र
बारहा तेरा इंतिज़ार किया
अपने ख़्वाबों में इक दुल्हन की तरह
- परवीन शाकिर
आवाज़ दे रहा था कोई मुझ को ख़्वाब में
लेकिन ख़बर नहीं कि बुलाया कहाँ गया
- फ़ैसल अजमी
दे हौसले की दाद के हम तेरे ग़म में आज
बैठे हैं महफ़िलों को सजाए तिरे बग़ैर
- अदील ज़ैदी
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम
- फ़ानी बदायूंनी
Urdu Poetry: मुझ से पहले उस गली में मेरे अफ़्साने गए