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मैंने प्रेम लिखा है जी भर लेकिन उसको निभा न पाया: रत्नेश अवस्थी “रत्न”

कविता
                
                                                         
                            मैंने  प्रेम  लिखा  है  जी  भर  लेकिन उसको निभा न पाया,
                                                                 
                            
फिर सोचा इस दुनिया को मैं कुछ अनुभव के गीत सुनाऊँ,

गीत  लिखे जो  मैंने  अपनी आँखों  के  भावाजल से,
कुछ पायल से छनक रहे  हैं कुछ बाँधें है आँचल से,
जिनके  ख़ातिर  मैं  रातों  में  ख़ुद  से  बातें करता हूँ,
और  पता  है उन  गीतों  में   मैं  भी  जीता  मरता  हूँ,

भावों  का  सागर  भीतर  है  इन  शब्दों  में  समा  न   पाया, 
फिर सोचा इस दुनिया को मैं कुछ अनुभव के गीत सुनाऊँ,

क्यों  गीतों  में  नाम  नहीं  है  बस  पहचान बताई है,
उस पागल को पागल कह कर आँखें भी भर आई हैं,
गीत  पढ़ोगे  जानोगे  क्यों  उसको  ऐसा  कहता  हूँ,
गीतों  को  भी  गीत   नहीं  अपने बेटे-सा  कहता हूँ,

हार  गया  हूँ  ख़ुद  से  ही  मैं  मुझको  कोई  हरा  न  पाया, 
फिर सोचा इस दुनिया को मैं कुछ अनुभव के गीत सुनाऊँ,

शायद  सुनकर  रो  देगी  वो  इसीलिए चुप रहता हूँ,
उपमाओं का हाथ पकड़ कर गीतों में सब कहता हूँ,
शून्य  हुआ  हूँ  मैं  भीतर  से  लेकिन  प्राण बचाने हैं,
कण्ठ  भले  ही  भर आये पर  मुझको गीत सुनाने हैं,

भूल गया मैं सब कुछ अपना लेकिन उसको भुला न पाया, 
फिर सोचा इस दुनिया को मैं कुछ अनुभव के गीत सुनाऊँ। 

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3 सप्ताह पहले

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