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मोहब्बत के ये कलाम बनाएंगे आपका वैलेंटाइन डे ख़ास

trainee kavya

Kavya Charcha
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                                                  प्रेम - प्रेम मानव ह्रदय की वह भावना है जिसमें मधुर विचारों का समावेश होता है। 'प्यार' ऐसा शब्द है जिसका केवल नाम सुनकर ही एक सुखद एहसास होने लगता है। प्रेम करने वालों के लिए यूं तो हर दिन ख़ास होता है परंतु प्रत्येक प्रेमी को अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने के लिए एक ख़ास अवसर की तलाश रहती है। जब समूचा सप्ताह ही प्रेम से भरा हुआ हो और ख़ासकर वह एक दिन यानि प्रेम दिवस 'वैलेंटाइन डे' तो सभी प्रेमियों का उत्साह चरम पर होता है।    
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

तब यदि अपनी प्रेम भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए हमें भावों से परिपूर्ण कविता, ग़ज़ल या शायरी का सहारा मिल जाए तो 'सोने पर सुहागा'

इसलिए प्रेम और स्नेह के इस ख़ास मौके को यादगार बनाने के लिए अमर उजाला काव्य आपके लिए लाया है प्रेम के कवियों और शायरों के चुनिंदा अल्फ़ाज़ जिनके माध्यम से आप अपने भावों को सहज और प्रभावशाली ढंग से ज़ाहिर कर सकते हैं।

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं 
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं 

तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता 
मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं 
- कैफ़ी आज़मी

जो बिस्मिल बना दे वो क़ातिल तबस्सुम

जो बिस्मिल बना दे वो क़ातिल तबस्सुम 
जो क़ातिल बना दे वो दिलकश नज़ारा 

मोहब्बत का भी खेल नाज़ुक है कितना 
नज़र मिल गई आप जीते मैं हारा 
- नुशूर वाहिदी


ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र ओ क़रार 
बे-क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी 

उस की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू 
कि तबीअ'त मिरी माइल कभी ऐसी तो न थी 
- बहादुर शाह ज़फर

सामने फिर वो बे-नक़ाब आए

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए 
इस के बा'द आए जो अज़ाब आए 

बाम-ए-मीना से माहताब उतरे 
दस्त-ए-साक़ी में आफ़्ताब आए 

हर रग-ए-ख़ूं में फिर चराग़ां हो 
सामने फिर वो बे-नक़ाब आए 
- फ़ैज़ अहमद फै़ज़

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का 
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
- मिर्ज़ा ग़ालिब 

ऐसा कहां से लाऊं कि तुझ सा कहें जिसे

आईना क्यूं न दूं कि तमाशा कहें जिसे 
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे
- मिर्ज़ा ग़ालिब

उस की नज़रों में इंतिख़ाब हुआ 
दिल अजब हुस्न से ख़राब हुआ 

इश्क़ का सेहर कामयाब हुआ 
मैं तिरा तू मिरा जवाब हुआ
 - जिगर मुरादाबादी

दीप की लौ सी तुम टिम-टिमाती रहो, मैं पतंगे के मानिंद जल जाऊंगा

प्रीत की तुम परीक्षा न लेना प्रिय,
प्रेमियों से मैं आगे निकल जाऊंगा
दीप की लौ सी तुम टिम-टिमाती रहो
मैं पतंगे के मानिंद जल जाऊंगा 
- अनिल मिश्रा

ज़ख्म भर जाएगें तुम मिलो तो सही
दिन संवर जाएगें तुम मिलो तो सही
रास्ते में खड़े दो अधूरे सपन
एक घर जाएंगे तुम मिलो तो सही
- डॉ. कुमार विश्वास 

रंग इस मौसम में भरना चाहिए
सोचती हूं प्यार करना चाहिए
ज़िंदगी को ज़िंदगी को वास्ते
रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए
 - अंजुम रहबर

6 वर्ष पहले
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