गांधी के प्रति उनके मन में अगाध प्रेम था, ये बात भी किसी से छिपी नहीं थी। बापू की हत्या पर उनका दुख और सात्विक क्रोध कविता बनकर फूट पड़ा था-
पर, त्राण कहाँ ? किस्मत के लाखों भोग अभी तक बाकी हैं
धरती के तन में एक नहीं, सौ रोग अभी तक बाकी हैं ।
जल रही आग दुर्गन्ध लिये, छा रहा चतुर्दिक् विकट धूम,
विष के मतवाले कुटिल नाग निर्भय फण जोड़े रहे घूम ।
विज्ञापन
द्वेषों का भीषण तिमिर-व्यूह, पग-पग प्रहरी हैं अविश्वास,
है चमू सजी दानवता की, खिलखिला रहा है सर्वनाश ।
पर, हो अधीर मत मानवते ! पर हो, अधीर मत मेरे मन !
है जूझ रही इस व्यूह-बीच धरती की कोमल एक किरण ।
अब प्रश्न नहीं, यह एक किरण किस तरह द्वन्द्व से छूटेगी,
है प्रश्न, व्यूह पर इसी तरह बाकी किरणें कब टूटेंगी ।
बापू ने राह बना डाली, चलना चाहे, संसार चले,
डगमग होते हों पाँव अगर तो पकड़ प्रेम का तार चले ।