गांधी के प्रति उनके मन में अगाध प्रेम था, ये बात भी किसी से छिपी नहीं थी। बापू की हत्या पर उनका दुख और सात्विक क्रोध कविता बनकर फूट पड़ा था-
पर, त्राण कहाँ ? किस्मत के लाखों भोग अभी तक बाकी हैं
धरती के तन में एक नहीं, सौ रोग अभी तक बाकी हैं ।
जल रही आग दुर्गन्ध लिये, छा रहा चतुर्दिक् विकट धूम,
विष के मतवाले कुटिल नाग निर्भय फण जोड़े रहे घूम ।
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X