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'क़िस्मत' पर चुनिंदा शायराना अल्फ़ाज़...

रत्नेश मिश्र

Kavya Charcha
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                                                  मेरे हवास इश्क़ में क्या कम हैं मुंतशिर 
मजनूँ का नाम हो गया क़िस्मत की बात है 
- अकबर इलाहाबादी

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल 
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा 
- अहमद फ़राज़

हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका 
सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा 
- बशीर बद्र
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किसी के तुम हो किसी का ख़ुदा है दुनिया में 
मिरे नसीब में तुम भी नहीं ख़ुदा भी नहीं 
- अख़्तर सईद ख़ान

टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर 
वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए 
- सज्जाद बाक़र रिज़वी

कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए 
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में 
- बहादुर शाह ज़फ़र

कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा 
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है 
- बशीर बद्र

रोज़ वो ख़्वाब में आते हैं गले मिलने को 
मैं जो सोता हूँ तो जाग उठती है क़िस्मत मेरी 
- जलील मानिकपूरी

बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला 
क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में 
- बहादुर शाह ज़फ़र

कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है 
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से 
- क़सरी कानपुरी

खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही 
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है 
- फ़िराक़ गोरखपुरी

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका 
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका 
- शकेब जलाली

तदबीर से क़िस्मत की बुराई नहीं जाती 
बिगड़ी हुई तक़दीर बनाई नहीं जाती 
- दाग़ देहलवी
6 वर्ष पहले
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