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ये हैं 'नासिर काज़मी' की 5 बेहतरीन ग़ज़लें...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए
वो कश्तियाँ जलाने वाले क्या हुए

वो सुबह आते-आते रह गई कहाँ
जो क़ाफ़िले थे आने वाले क्या हुए

मैं जिन की राह देखता हूँ रात भर
वो रौशनी दिखाने वाले क्या हुए

ये कौन लोग हैं मेरे इधर-उधर
वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए

इमारतें तो जल के राख हो गईं
इमारतें बनाने वाले क्या हुए

ये आप-हम तो बोझ हैं ज़मीन के
ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए

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अपनी धुन में रहता हूँ...

अपनी धुन में रहता हूँ, मैं भी तेरे जैसा हूँ 

ओ पिछली रुत के साथी, अब के बरस मैं तन्हा हूँ 

तेरी गली में सारा दिन, दुख के कंकर चुनता हूँ 

मुझ से आँख मिलाये कौन, मैं तेरा आईना हूँ

मेरा दिया जलाये कौन, मैं तेरा ख़ाली कमरा हूँ

तू जीवन की भरी गली, मैं जंगल का रस्ता हूँ

अपनी लहर है अपना रोग, दरिया हूँ और प्यासा हूँ 

आती रुत मुझे रोयेगी, जाती रुत का झोंका हूँ

हुस्न को दिल में छुपा कर देखो...

हुस्न को दिल में छुपा कर देखो
ध्यान की शमा जला कर देखो

क्या खबर कोई दफीना मिल जाये
कोई दीवार गिरा कर देखो

फाख्ता चुप है बड़ी देर से क्यूँ
सरो की शाख हिला कर देखो

नहर क्यूँ सो गई चलते-चलते
कोई पत्थर ही गिरा कर देखो

दिल में बेताब हैं क्या-क्या मंज़र
कभी इस शहर में आ कर देखो

इन अंधेरों में किरन है कोई
शबज़दों आंख उठाकर देखो

कौन इस राह से गुज़रता है...

कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है

देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है

शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है

ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है

दिल तो मेरा उदास है "नासिर"
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है

ये भी क्या शाम-ए-मुलाक़ात आई...

ये भी क्या शाम-ए-मुलाक़ात आई
लब पे मुश्किल से तेरी बात आई 

सुबह से चुप हैं तेरे हिज्र नसीब
हाय क्या होगा अगर रात आई 

बस्तियाँ छोड़ के बरसे बादल
किस क़यामत की ये बरसात आई 

कोई जब मिल के हुआ था रुख़सत
दिल-ए-बेताब वही रात आई

साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-बुताँ में 'नासिर' 
एक से एक नई रात आई


साभार- कविताकोश

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