शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास
रौनक़ें जितनी यहां हैं औरतों के दम से हैं
- मुनीर नियाज़ी
औरत को समझता था जो मर्दों का खिलौना
उस शख़्स को दामाद भी वैसा ही मिला है
- तनवीर सिप्रा
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तमाम पैकर-ए-बदसूरती है मर्द की ज़ात
मुझे यक़ीं है ख़ुदा मर्द हो नहीं सकता
- फ़रहत एहसास
औरत अपना आप बचाए तब भी मुजरिम होती है
औरत अपना आप गंवाए तब भी मुजरिम होती है
- नीलमा सरवर
तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
- असरार-उल-हक़ मजाज़
तू आग में ऐ औरत ज़िंदा भी जली बरसों
सांचे में हर इक ग़म के चुप-चाप ढली बरसों
- हबीब जालिब
तुम भी आख़िर हो मर्द क्या जानो
एक औरत का दर्द क्या जानो
- सय्यदा अरशिया हक़
अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता
वो देखो एक औरत आ रही है
- शकील जमाली
औरत हूं मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूं
इक सच के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सब से लड़ी हूं
- फ़रहत ज़ाहिद
मिट्टी पे नुमूदार हैं पानी के ज़ख़ीरे
इन में कोई औरत से ज़ियादा नहीं गहरा
- सरवत हुसैन