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सावन स्पेशल: बूंदन भीगे मोरी सारी अब तो जाने दे बनवारी...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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                            वर्षा ऋतु में ख़ासकर सावन महीने की अनुभूति शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। दिल को घेरती कारी घटाओं को देख नायिका के मन में बहुत ख़ुशी भी होती है और एक टीस भी उठती है। कजरी में यह टीस विरह के रूप में व्यक्त हुई है। सावनी फुहारें पड़ती हैं और प्रियतम पास नहीं होते तो जैसे मन भटकने लगता है, कहीं दूर चला जाता है। फिर जो भाव उठता है वह गीतों में कहीं मल्हार है तो कही मेघ और कहीं ठुमरी तो कहीं कजरी के रूप में लोक मानस में रचा बसा है। बारिश की फुहारों के साथ महिलाएं बरबस गीत गुनगुनाने लगती हैं। ख़ुशी के झूले पड़ जाते हैं। यह कहना है कि बनारस घराने की ख्याल गायकी की मशहूर जोड़ी पद्मभूषण पं. राजन मिश्र पं.साजन मिश्र की शिष्या डॉ. नबनीता चौधरी का। 
        
                                                    
                            

ख्याल, टप्पा से लेकर बोल बनाव की ठुमरी को सुरों की मिठास में उतारने वाली बनारस घराने की गायिका नबनीता सावन को स्त्रियों के जीवन की सबसे बड़ी संपदा मानती हैं। वह कहती हैं कि सावन खुशियों की सौगात बनकर आता है। वह बचपन के अपने अनुभवों को साझा करती है, जब वह काली घटा छाने के बाद बारिश की बूंदों को हथेलियों पर रोकने के लिए छतों पर खड़ी हो जाया करती थीं। वह बंदिश सुनाती हैं- 

बरसन लागी रे बदरिया सावन की
अतिकारी अतिभारी डरपावनी...। 

वह कहती हैं कि इस कारी घटा को देख कर दिल में उठने वाले डर को बयां करना आसान नहीं होता। 
राग मिया मल्हार की बंदिश का वह उदाहरण देती हैं- 

बूंदन भीगे मोरी सारी
अब तो जाने दे बनवारी...। 

वह बताती हैं कि प्रेमी से मिलने के बाद नायिका की सारी भीग जाती है तब वह कहती है कि अब मुझे जाने दो भीग गई हूं....। भीतर से भीगना प्रेम का एहसास कराता है। 

वह राग पीलू में कजरी की बंदिश गाती हैं- 

बरसन लागी सावन बूंदिया राजा 
तोरे बिन लागे ना मोरा जिया...
प्रेम अरजिया भीनी भीनी
प्रेम की पतिया मीठी मीठी
दुखवा अपना मैं ना कहूंगी
देखन तड़पत देख मरुंगी
तोरे बिना लागे ना मोरा जिया राजा ....। 

इस बंदिश में नायिका अरजी लगाती है कि उसका प्रेम रस कितना भीना है, कितना मीठा है। इसे सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है। वह कहती है कि इस विरह का दुख वह किसी से कह नहीं सकती। वह बताती हैं कि जब से स्वर-शब्द का मिलन हुआ है, तब से प्रेम की कजरी कंठों में समाई हुई है। 

बरसन लागी बदरिया झूम झूम के...
बोलन लागी कोयलिया झूम झूम के
आयो सावन अति भावन
रूम झूम रूम झूम के
सखिया गावें कजरिया झूम झूम के...।  

कजरी शृंगार रस प्रधान गीत है लेकिन गीतों में परिस्थितियां अलग-अलग मिलती हैं। कभी जाने -बिछड़ने का विरह तो कभी मिलन की आकुलता...। 
वह पीलू में दूसरी बंदिश गुनगुनाती हैं-

लाग रही तेरी सावन की झड़ी ए री 
ए मैं भीजत तुम बिन कबसे खड़ी..
सपने में आए पिया मोरा मन ले गयो... 
दे गए असुअन की झड़ी...। 

वह मेघ की बंदिश के जरिए सावन के भावों को ताजा करती हैं-

गरजत बरसत भीजत आई हो तुम्हरे मिलन को 
अपने प्रेमी पियरवा लो गरवा लगाय...।
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