विज्ञापन

दश्त यानी जंगल पर कहे शायरों के अल्फ़ाज़

deepali agrawal

Kavya Charcha
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  

फिरते थे दश्त दश्त दिवाने किधर गए
वे आशिक़ी के हाए ज़माने किधर गए
- अज्ञात


दश्त गुलज़ार हुआ जाता है
क्या यहाँ अहल-ए-वफ़ा बैठे थे
- सफ़िया शमीम

विज्ञापन

दश्त की ख़ाक भी छानी है
घर सी कहाँ वीरानी है
- विकास शर्मा राज़


कुछ दिनों दश्त भी आबाद हुआ चाहता है
कुछ दिनों के लिए अब शहर को वीरानी दे
- नदीम अहमद

ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे
तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है
- शकेब जलाली


कब से बंजर थी नज़र ख़्वाब तो आया
शुक्र है दश्त में सैलाब तो आया
- ग़ुफ़रान अमजद

कोई तो दश्त समुंदर में ढल गया आख़िर
किसी के हिज्र में रो रो के भर गया था मैं
- अहमद ख़याल


प्यासे रहो न दश्त में बारिश के मुंतज़िर
मारो ज़मीं पे पाँव कि पानी निकल पड़े
- इक़बाल साजिद

हम जुनूँ वाले हैं हम से कभी पूछो प्यारे
दश्त कहते हैं किसे दश्त की वहशत कैसी
- अज़ीज़ नबील


मेरी मंज़िल न कहीं थी तो मुझे
दश्त-दर-दश्त फिराया क्यूँ था
- मोहसिन ज़ैदी

6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

Nema Ram

141 कविताएं

View Profile