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भवानी प्रसाद मिश्र: जिनकी कविताओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि कवि बात कर रहा है

अमर शर्मा

Kavya Charcha
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                                                  भवानी प्रसाद मिश्र हिंदी के प्रसिद्ध कवि तथा गांधीवादी विचारक थे। ये आम लोगों से उनका जुड़ाव था कि प्यार से लोग उन्हें भवानी भाई कहकर संबोधित किया करते थे। भवानी प्रसाद मिश्र उन गिने चुने कवियों में थे जो कविता को ही अपना धर्म मानते थे और आम जनों की बात उनकी भाषा में ही रखते थे। उन्होंने कवियों को नसीहत भी दी,

जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख।

अज्ञेय ने दूसरे तार-सप्तक में उनकी कविता को प्रकाशित किया। उनका प्रथम संग्रह 'गीत-फ़रोश' अपनी नई शैली, नई उद्भावनाओं और नये पाठ-प्रवाह के कारण काफ़ी लोकप्रिय हुआ।
 
हिंदी के प्रसिद्ध कवि, नाटककार और आलोचक नंदकिशोर आचार्य ‘हिंदी समय’ पर भवानी प्रसाद मिश्र को याद करते हुए लिखते हैं, "1973 में वे भवानी भाई से पहली बार मिले। पहली ही मुलाकात में उनके सादा व्यक्तित्व और निश्छल स्नेह ने मुझे अभिभूत कर दिया। यह प्रभाव फिर गहराता ही गया। भवानी भाई की प्रसिद्धि एक गांधीवादी लेखक के रूप में थी।

लेकिन विचारधारा और कविता के संबंधों के सवाल पर उनका स्पष्ट मत था कि 'कविता किसी विचारधारा की अभिव्यक्ति का उपकरण नहीं है - बल्कि वह अभिव्यक्ति का माध्यम तभी तक है जब तक हम उसके माध्यम से किसी पूर्वनिर्धारित सत्य को कहना चाहते हैं। एक कवि के रूप में मेरे पास कुछ भी पूर्वनिर्धारित नहीं है। कविता मेरे लिए अभिव्यक्ति नहीं, अनुभव का माध्यम है।" इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि उनकी सर्वोच्च आस्था शब्द में हो। 
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भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च 1914 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले में टिगरिया गांव में हुआ था। उन्होंने संस्कृत, हिंदी और अंग्रेज़ी विषय से बीए की शिक्षा पूरी की। महात्मा गांधी के विचारों के अनुसार शिक्षा देने के विचार से एक स्कूल खोलकर अध्यापन कार्य शुरू किया और उस स्कूल को चलाते हुए 1942 में गिरफ्तार होकर 1945 में छूटे। इसके बाद अगले पांच साल उन्होंने वर्धा के महिलाश्रम में शिक्षा देते हुए बिताया.
 
उनकी कविताओं में नये भारत का स्वप्न झलकता है। उनकी कविताएं परिवर्तन और सुधार की अभिव्यक्ति हैं। उन्होंने ख़ुद को कभी निराशा के गर्त में डूबने नहीं दिया। आज़ादी के आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया तो बाद में तानाशाही के ख़िलाफ़ भी आवाज़ बुलंद की। उन्होंने आपातकाल का विरोध किया। विरोध स्वरूप वे हर रोज़ नियमपूर्वक सुबह दोपहर शाम तीनों पहर में तीन कविताएं लिखते थे। ये कविताएं बाद में त्रिकाल सन्ध्या नामक पुस्तक में प्रकाशित हुईं। 

वे दिल्ली से नरसिंहपुर एक विवाह समारोह में गये थे वहीं अचानक बीमार हो गये और अपने सगे सम्बन्धियों व परिवार के लोगों के बीच 20 फ़रवरी 1985 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 

भवानी भाई को 1972 में उनकी कृति बुनी हुई रस्सी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1981-82 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्यकार सम्मान दिया गया और 1983 में उन्हें मध्य प्रदेश शासन के शिखर सम्मान से अलंकृत किया गया।
 
भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि कवि बोल रहा है, बात कर रहा है। वे गूढ़ बातों को भी बहुत सरलता के साथ अपनी कविताओं में पिरोते थे। नई कविताओं में उनका काफी योगदान है। वे जनता की बात को जनभाषा में ही रखते थे।

नंद किशोर आचार्य जी लिखते हैं भवानी भाई की कविता के हवाले से अज्ञेय का नई कविता के इस अनूठे रस को मिश्र रस कहना और गंभीर बात को हलके ढंग से कहने की इस भंगिमा को उल्लेखनीय मानना सही लगता है। भवानी भाई जिस किसी भी चीज के बारे में बतियाते हैं, उसे घरेलू बना देते हैं- प्रकृति तक को।  'अँधेरी रात' कविता को देखिए,
 
बहुत दूर
दक्षिण की तरफ
नीली है पहाड़ की चोटी
और लोटी-लोटी लग रही है
आंगन के पौधे की आत्मा
स्तब्ध इस शाम के
पांवों पर। 

बुढ़ापा और मृत्यु तक के प्रति भवानी भाई एक आत्मीय स्वर में बात करते हैं और यह स्वर विस्मित करता है - ख़ासतौर पर जब पश्चिम के आधुनिक साहित्य में इसका शोकपूर्ण अनुभव ही सघन दिखता है।
 
'आराम से भाई ज़िंदगी' कविता में वे लिखते हैं,
 
आराम से भाई ज़िंदगी
ज़रा आराम से
तेज़ी तुम्हारे प्यार की बरदाश्त नहीं होती अब
इतना कस कर किया गया आलिंगन
ज़रा ज़्यादा है इस जर्जर शरीर को। 

 

भवानी भाई की प्रेम कविताएं भी अलग से ध्यान आकर्षित करती हैं- खासतौर पर प्रौढ़ प्रेम की कविताएँ जिनमें उद्दाम श्रृंगारिकता के बजाय आत्मीय सहजीवन और उसके सुख-दुख ही प्रेम की व्यंजना है।
 
'क्या चाहती हो तुम' कविता में लिखा,
 
कैसे कहता
सबसे बड़ा सुख
सपने में मिला था
सच यही है
मगर इस सच को कभी मैंने दुख नहीं बनने दिया
और ले लिए इसलिए उस दिन
सवाल के जवाब में सरला के दोनों हाथ
हाथों में
और देखा हम दोनों ने चुपचाप
एक दूसरे को थोड़ी देर।

 

आचार्य जी लिखते हैं कि भवानी भाई की कविता में जब भी व्यंग्य या क्षोभ दिखाई देता है- बल्कि उनकी भी उल्लेखनीय उपस्थिति वहां है- तो आत्मीयता के अभाव या उस पर हुए आघातों के विभिन्न रूपों के प्रति विरोध के रूप में ही। इसलिए वहां भी घृणा नहीं, एक सात्विक क्रोध की ही अभिव्यक्ति है।
 
आचार्य जी सवाल करते हैं, “लेकिन तब क्या भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य-संसार साधारण भारतीय जन के ऐतिहासिक और मानसिक द्वंद्वों से प्रसूत अहिंसा-बोध या संवेदन की आधुनिक प्रक्रिया का प्रतिफलन ही नहीं है? हाँ, निश्चय ही वह काव्यात्मक प्रक्रिया का प्रतिफलन है।“

(नंद किशोर आचार्य आईआईआईटी, हैदराबाद में प्रोफेसर एमेरिटस हैं।)
5 वर्ष पहले
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