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सुहानी सांझ और ये 20 बड़े शेर...

काव्य डेस्क

Kavya Charcha
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पूरे दिन की दौड़-भाग के बाद जब शाम आती है तो कुछ देर सुस्ताकर ज़िंदग़ी को गहराई से सोचने का मौका मिलता है। शाम की इसी खामोशी को शायरों ने अपने लफ़्ज़ों में कागज़ पर उतारा है, पेश हैं ऐसे ही कुछ चुनिंदा शेर
 

तेरे आने की उम्मीद और भी तड़पाती है
मेरी खिड़की पे जब शाम उतर आती है
- अज्ञात


तुम ना लगा पाओगे अंदाज़ा मेरी तबाही का
तुमने देखा ही कहां है मुझे शाम होने के बाद
- अज्ञात
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अब कौन मुंतज़िर है...

अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहां
शाम आ गयी है लौट के घर जाएं हम तो क्या
- मुनीर नियाज़ी


अब तो चुप-चाप शाम आती है
पहले चिड़ियों के शोर होते थे
- मोहम्मद अल्वी

कभी तो आसमां से चांद उतरे...

कभी तो आसमां से चांद उतरे जाम हो जाए
तुम्हारे नाम की एक ख़ूबसूरत शाम हो जाए
- बशीर बद्र


नई सुबह पर नज़र पहुंचे मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता- रफ़्ता कहीं शाम तक ना पहुंचे
- शकील बदायुनी

तुम्हारे शहर का मौसम...

तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगा
मैं एक शाम चुरा लूं अगर बुरा ना लगे
- क़ैसर उल ज़ाफ़री


बस एक शाम का हर शाम इंतज़ार रहा
मगर वो शाम किसी शाम भी नहीं आयी
- अजमल सिराज

होती है शाम...

होती है शाम आंख से आंसू रवां हुए
ये वक़्त कैदियों की रिहायी का वक़्त है
- अहमद मुश्ताक


शाम भी थी धुआं धुआं हुस्न भी था उदास-उदास
दिल को कई कहानियां याद सी आकर रह गयीं
- फ़िराक़ गोरखपुरी

शाम ढले ये सोच के...

शाम ढले ये सोच के बैठे हम अपनी तस्वीर के पास
सारी ग़ज़लें बैठी होंगी अपनी अपनी मीर के पास
- सागर आज़मी


शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
कूचा-ए-जां में सदा करती है
- परवीन शाकिर

शामें किसी को...

शामें किसी को मांगती हैं आज भी फ़िराक
गो ज़िंदग़ी में यूं मुझे कोई कमी नहीं
- फ़िराक गोरखपुरी


यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
- शकील बदायुनी

शाम से आंख...

शाम से आंख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
- गुलज़ार


कंपकंपाती शाम ने कल मांग ली चादर मेरी
और जाते-जाते जाड़े को इशारा कर दिया
- अज्ञात

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम...

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं
- क़तील शिफ़ाई


आप ही होगा उसे शाम का एहसास “क़मर”
चढ़ रहा है अभी सुरज इसे ढल जाने दो
- क़मर

कभी-कभी शाम

कभी-कभी शाम ऐसे ढलती है जैसे घूंघट उतर रहा हो,
तुम्हारे सीने से उठता धुआँ हमारे दिल से गुज़र रहा हो 
- अज्ञात


वही ख़्वाब ख़्वाब हैं रास्ते वही इंतज़ार सी शाम है
ये सफर है मेरे इश्क़ का,न दयार है न क़याम है
- सुख़नवर
 
7 वर्ष पहले
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