सुबह का वक़्त बेहद ख़ास होता है क्यूंकि हर आने वाले दिन के साथ कई उम्मीदें भी जाग जाती हैं। हर नये दिन के साथ नई ताजगी और नए सपने भी दस्तक देने लगते हैं और विश्वास भी की ज़िंदग़ी भी और ताज़ा हो जाएगी। इसी सुबह पर पेश हैं कुछ ख़ूबसूरत चुनिंदा शेर
ज़ुल्फ़ की शाम सुब्ह चेहरे की
यही मौसम जनाब दे दीजे
- साबिर दत्त
आँख खुलते ही याद आ जाता है तेरा चेहरा,
दिन की ये पहली ख़ुशी भी कमाल होती है
- अज्ञात
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अब आ गई है सहर अपना घर सँभालने को
चलूँ कि जागा हुआ रात भर का मैं भी हूँ
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे
- शकील बदायुनी
रोने वाले हुए चुप हिज्र की दुनिया बदली
शमा बे-नूर हुई सुब्ह का तारा निकला
- फ़िराक़ गोरखपुरी
रात आ कर गुज़र भी जाती है
इक हमारी सहर नहीं होती
- इब्न-ए-इंशा
ये एहतिमाम-ए-चराग़ाँ बजा सही लेकिन
सहर तो हो नहीं सकती दिए जलाने से
- बशर नवाज़
सूरज चढ़ा तो फिर भी वही लोग ज़द में थे
शब भर जो इंतिज़ार-ए-सहर देखते रहे
- मोहसिन भोपाली
बाद तकलीफ़ के राहत है यक़ीनी 'वाहिद
रात का आना ही पैग़ाम-ए-सहर होता है
- वाहिद प्रेमी
इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो
मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो
- नरेश कुमार शाद
लाख आफ़्ताब पास से हो कर गुज़र गए
हम बैठे इंतिज़ार-ए-सहर देखते रहे
- जिगर मुरादाबादी
ऐसे खोए सहर के दीवाने
लूट कर शाम तक न घर आए
- मतीन नियाज़ी
कैसे होती है शब की सहर देखते
काश हम भी कभी जाग कर देखते
- नीना सहर
शब को मिरा जनाज़ा जाएगा यूँ निकल कर
रह जाएँगे सहर को दुश्मन भी हाथ मल कर
- क़मर जलालवी
अपने चेहरे से जो ज़ुल्फ़ों को हटाया उस ने
देख ली शाम ने ताबिंदा सहर की सूरत
- अातिश बहावलपुरी
सहर के साथ चले रौशनी के साथ चले
तमाम उम्र किसी अजनबी के साथ चले
- ख़ुर्शीद अहमद जामी
सोता रहा होंटों पे तबस्सुम का सवेरा
रह रह के जगाते रहे तक़दीर-ए-सहर हम
- सिराज लखनवी
अब आ गई है सहर अपना घर सँभालने को
चलूँ कि जागा हुआ रात भर का मैं भी हूँ
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
जो दिन चढ़ा तो हमें नींद की ज़रूरत थी
सहर की आस में हम लोग रात भर जागे
- जावेद अनवर
बज़्म से दूर वो गाता रहा तन्हा तन्हा
सो गया साज़ पे सर रख के सहर से पहले
- मख़दूम मुहिउद्दीन
वफ़ा की प्यार की ग़म की कहानियाँ लिख कर
सहर के हाथ में दिल की किताब देता हूँ
- ख़ुर्शीद अहमद जामी