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आज का शब्द- उद्भ्रांत और गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता: वे बातें लौट न आएंगी

हरि कर्की

Aaj Ka Shabd
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                                                  अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- उद्भ्रांत, जिसका अर्थ है- घूमता हुआ, चकित, विह्वल; विकल। प्रस्तुत है गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता: वे बातें लौट न आएंगी...


खगदल हैं ऐसे भी कि न जो
आते हैं, लौट नहीं आते
वह लिए ललाई नीलापन
वह आसमान का पीलापन
चुपचाप लीलता है जिनको
वे गुंजन लौट नहीं आते
वे बातें लौट नहीं आतीं
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बीते क्षण लौट नहीं आते
बीती सुगन्ध की सौरभ भर
पर, यादें लौट चली आतीं
पीछे छूटे, दल से पिछड़े

भटके-भरमे उड़ते खग-सी
वह लहरी कोमल अक्षर थी
अब पूरा छन्द बन गई है —
'तरू-छायाओं के घेरे में
#उद्भ्रांत जुन्हाई के हिलते

छोटे-छोटे मधु-बिम्बों-सी
वह याद तुम्हारी आई है' —

पर बातें लौट न आएंगी
बीते पल लौट न आएंगे।
5 वर्ष पहले
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