विज्ञापन

आज का शब्द- परिधि और राजकमल चौधरी की कविता: चिंता अर्थहीन बेबसी

हरि कर्की

Aaj Ka Shabd
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- परिधि, जिसका अर्थ है-  बाहरी सीमा, गोल घेरा, वृत्त की रेखा। प्रस्तुत है राजकमल चौधरी की कविता: चिंता अर्थहीन बेबसी।


आकाश के अस्थिर चित्र नीचे झुकेंगे और 
झुकेंगे, झूलेंगे मेघ 
ऊंचे वृक्षों के माध्यम से, साधन से धरती 
(कुंवारी है अब तक जिसकी पिपासा...) 
ऊपर उठेगी 
उठती, उभरती, उजागर होती चली जाएगी! 
और, 
अनेकों निरुद्देश्य, निरीह लोग यों ही जग जाएंगे, 
विज्ञापन

एक धुआं उठेगा उबलता हुआ 
चाहे यह धुआं ‘टियरगैस' ही क्यों न हो? 
एक अलाव जलेगा चटकता हुआ। 
चाहे इसमें हमारे पांव ही क्यों न जल जाएं? 
मगर, निरीह लोग यों ही जग जाएंगे 
वायु के अकस्मात पिघले हुए झोंकों से चौंककर 
टूट जाएगा उनकी विवशताओं का ख़ुमार, 
टूट जाएगा ज़ेहन पर नया गर्दोगुबार 
(आदमी है; आख़िर, साफ़-सुथरा रहना ही चाहिए 
मोटी-मोटी फ़ाइलों का कूड़ा बुहारने लग जाएंगे) 

ऑफ़िसों के टेबुल पर ऊंघते हुए लोग, 
काग़ज़ के महल, बाग़-बग़ीचे, घर-परिवार बनाने लगेंगे 
रेसकोर्स के टिकट-घर की क्यू में खड़े आदमी! 
और, जीवन की पांडुग्रस्त रोशनी का बौना स्तंभ 
ऊदी भनभनाहटों से घिर-घर जाएगा व्यर्थ! 

हर ओर से टूटे हुए पालों की नौकाएं आएंगी 
टकराएंगी अंधेरे में, अनर्थ! 
डूबी हुई नावों में डूबे हुए लोग 
उतार फेंकेंगे शील का रेशमी वस्त्र-खंड 
उतार फेंकेंगे चेहरे संस्कृतियों की नक़ाब, 
जल के तल पर कौन किसे जानेगा पहचानेगा? 
अनस्तित्व की परिधि में कौन किसे मानेगा, संभालेगा? 
नंगे हो जाएंगे 
भिखमंगे हो जाएंगे 
मगर, किसके लिए-किसके लिए?—किसके लिए? 

क्योंकि, 
अहल्याएं तो अभी तक पत्थर बनी सोई हैं, 
(तुमने ही दिया था शाप—हे गौतम! 
तम से उन्हें उबारे कौन?) 
अनागत के आने की दुविधा में खोई है, 
क्योंकि, 
सभी व्यक्ति तुम जैसे ही, मुझ ऐसे ही 
टूटे हुए 
टूटे हुए 
डूबे हुए 

चौराहों के बुझे-बुझे लैंप-पोस्ट, 
खेतों के उजड़े हुए मचानों के बांस-खंभे, 
फूल पात फल डाल रहित वृक्ष 
ऊंचे शो-केसों के पारदर्शी शीशे, 
(जिनमें खड़ी हैं प्लास्टिक की प्रकृत-वस्त्रा महिलाएं) 
गुलदस्तों में जमाए गए काग़ज़ के गुलाब खड़े हैं 
थकी-थकी हारी हुई, भारी हुई मुद्राओं में 

उफ! कहीं कोई शब्द नहीं 
शब्द नहीं, वाक्य, ध्वनि, लय, छंद, गीत नहीं 
उठता उभरता है उनके अंदर! 
मगर, वे नहीं गाएंगे, 
वे नहीं सोई हुई अहल्या को जगाएंगे 
तो क्या अनागत नहीं आएगा? 
तो, क्या कोई नहीं आएगा? 
गूंगा ही रह जाएगा सारा संसार? 
खुलेगा नहीं गीतों का द्वार? 

साभार - कविताकोश
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all