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कथा

2 Followers 11 Poems

Mannu bhandari: मन्नू भंडारी की मार्मिक कहानी 'अकेली'

काव्य डेस्क

Katha
                                                                
                                                    सोमा बुआ बुढ़िया है।
सोमा बुआ परित्यक्ता है।
सोमा बुआ अकेली है।

सोमा बुआ का जवान बेटा क्या जाता रहा, उनकी जवानी चली गयी। पति को पुत्र-वियोग का ऐसा सदमा लगा कि व पत्नी, घर-बार तजकर तीरथवासी हुए और परिवार में कोई ऐसा सदस्य...और पढ़ें
3 years ago

नदी का घर (लघुकथा) - विजय जोशी 'शीतांशु'

काव्य डेस्क

Katha
                                                                
                                                    आज गांव ने शहर से ऐसा प्रश्न कर लिया जिसका ज़िक्र शहर के लिए इतिहास हो गया था। गांव ने पूछा- 'तुम्हारे यहां एक नदी रहा करती थी। उस नदी का घर कहां है?"
आधुनिक शहर ने तपाक से प्रश्न पर, आश्चर्यचकित प्रश्न कर दिया! 'वह पुराना नाला?'...और पढ़ें
5 years ago
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विजय जोशी 'शीतांशु' की लघुकथा: जब नदी से कुँए दोस्ती की....

रत्नेश मिश्र

Katha
                                                                
                                                    नदी के पास एक कुँआ था। जिस  कुँए से उसने दोस्ती कर ली। वर्षा ऋतु में तो दोनों की खूब निभी। दोनों के पास पर्याप्त रूप में जल-निधि थी। धीरे धीरे वर्षा ने अपना साम्राज्य समेटना आरम्भ कर, शरद-शिशिर को प्रकृति का दायित्व संभालने को दे दिया। प्रकृति तो खुश...और पढ़ें
                                                
5 years ago

लोककथा: हेतु सेठ जी ने कहा- जब हरि की इच्छा है तो हम हम क्या सहायता करेंगे लेकिन जैसे ही मंत्रीजी का नाम सुना... 

रत्नेश मिश्र

Katha
                                                                
                                                    बाढ़-पीड़ितों के लिए चंदा हो रहा था। कुछ जनसेवकों ने एक संगीत-समारोह का आयोजन किया, जिसमें धन एकत्र करने की योजना बनाई। वे पहुँचे एक बड़े सेठ साहब के पास। उनसे कहा, 'देश पर इस समय संकट आया है। लाखों भाई-बहन बेघर-बार हैं, उनके लिए अन्न-वस्त्र जुटा...और पढ़ें
                                                
5 years ago
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विजय जोशी 'शीतांशु' की  लघुकथा- खूँटे से बँधी

रत्नेश मिश्र

Katha
                                                                
                                                    उसे गाय नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि वह घास नहीं खाती। उसे देखकर नज़रों में एकाएक गाय का अक्स उभर जाता है। खूँटे से बँधी, उसे चरने के लिए बाहर जाने की इजाज़त नहीं है। खूँटे के सामने जो मिला, वही खाना है और जीवन पथ पर बिना खुरों के चलने पर मजबूर है।...और पढ़ें
                                                
5 years ago

चंदन पांडेय की कहानी: समय के दो भाई...

रत्नेश मिश्र

Katha
                                                                
                                                    पता नहीं कौन से समय की बात है कि उसके दो भाई थे। पहले का पुकार नाम बड़े था और दूसरे का - बहुत बड़े। दोनों अमीरजादे, ख्याली, शराबी और आलसी थे। इसलिए चिंतक भी। ये दोनों भाई शराब की ही नींद उठते थे। सुबह का कुल्ला बीयर से और निबटान आदि का काम सस्ती शराब...और पढ़ें
                                                
5 years ago

ज्ञानरंजन मशहूर कहानी: पिता 

रत्नेश मिश्र

Katha
                                                                
                                                    उसने अपने बिस्तरे का अंदाज लेने के लिए मात्र आध पल को बिजली जलाई। बिस्तरे फर्श पर बिछे हुए थे। उसकी स्त्री ने सोते-सोते ही बड़बड़ाया, 'आ गए' और बच्चे की तरफ करवट लेकर चुप हो गई। लेट जाने पर उसे एक बड़ी डकार आती मालूम पड़ी, लेकिन उसने डकार ली नहीं...और पढ़ें
                                                
5 years ago

यशपाल जैन की लघुकथा: जब चोर ने राजा को परेशानी में डाल दिया 

रत्नेश मिश्र

Katha
                                                                
                                                    पुराने जमाने की बात है। एक आदमी को अपराध में पकड़ा गया। उसे राजा के सामने पेश किया गया। उन दिनों चोरो को फाँसी की सजा दी जाती थी। अपराध सिद्ध हो जाने पर इस आदमी को भी फाँसी की सजा मिली। राजा ने कहा, 'फाँसी पर चढ़ने से पहले तुम्हारी कोई इच्छा हो त...और पढ़ें
                                                
5 years ago

कहानी: कभी-कभी हँसने वालियां

रत्नेश मिश्र

Katha
                                                                
                                                    एक- यार धरा अभी तक नहीं आई।
दो- बहुत भूख लग रही है यार
तीन- दो घंटे का बोलकर आई हूँ, पता पड़ा बिना खाए ही लौटना पड़ेगा।
चार- चिंकू को पड़ोसी के यहाँ छोड़कर आई थी कि फटाफट मिलेंगे और लौट आएँगे पर ये धरा लेट करवा रही है।...और पढ़ें
5 years ago

कहानी: 'फ़ौजी चाय' और वीर सिंह की यादें 

रत्नेश मिश्र

Katha
                                                                
                                                    केतली में उबलती चाय, धातु के मग्गे और कड़कड़ाती सर्दी। ऐसे ही तो दोस्ती हुई थी हमारी। वह वीर सिंह और मैं बंसीलाल। वह पंजाब से  तो मैं राजस्थान से। दोनों ही चाय व खाने के शौकीन। ड्यूटी पर साथ - साथ होना, फ़ुर्सत में हिंदी फ़िल्मों के गीत गुनगुनाना और...और पढ़ें
                                                
5 years ago
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