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कहानी: 'फ़ौजी चाय' और वीर सिंह की यादें 

कहानी: 'फ़ौजी चाय' और वीर सिंह की यादें 
                
                                                         
                            केतली में उबलती चाय, धातु के मग्गे और कड़कड़ाती सर्दी। ऐसे ही तो दोस्ती हुई थी हमारी। वह वीर सिंह और मैं बंसीलाल। वह पंजाब से  तो मैं राजस्थान से। दोनों ही चाय व खाने के शौकीन। ड्यूटी पर साथ - साथ होना, फ़ुर्सत में हिंदी फ़िल्मों के गीत गुनगुनाना और गरमा - गरम चाय पीकर हाथ तापना। बड़े मज़े के दिन थे वे।
                                                                 
                            

ये उन दिनों की बात है जब करगिल युद्ध से पहले हम दोनों की पहली पोस्टिंग ही उस बर्फीले इलाके में हुई थी। घरवालों से दूर, अनुशासन भरी दिनचर्या में दो पलों का सुकून तब ही मिल पाता था, जब हमारा दल चाय के लिए रुककर सुस्ताता था । घर पर मां के हाथों की चाय और नाज़ुक - से कप- केतली, आंखों से हटते नहीं थे। यहां तो खुद ही सारा बंदोबस्त करना पड़ता था और ऐसे मग्गों में चाय पीने के खयाल से ही उबकाई आने लगती । आगे पढ़ें

5 वर्ष पहले

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