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ज्ञानरंजन मशहूर कहानी: पिता 

gyanranjan
                
                                                         
                            उसने अपने बिस्तरे का अंदाज लेने के लिए मात्र आध पल को बिजली जलाई। बिस्तरे फर्श पर बिछे हुए थे। उसकी स्त्री ने सोते-सोते ही बड़बड़ाया, 'आ गए' और बच्चे की तरफ करवट लेकर चुप हो गई। लेट जाने पर उसे एक बड़ी डकार आती मालूम पड़ी, लेकिन उसने डकार ली नहीं। उसे लगा कि ऐसा करने से उस चुप्पी में खलल पड़ जाएगा, जो चारों तरफ भरी है, और काफी रात गए ऐसा होना उचित नहीं है।
                                                                 
                            

अभी घनश्यामनगर के मकानों के लंबे सिलसिलों के किनारे-किनारे सवारी गाड़ी धड़धड़ाती हुई गुजरी। थोड़ी देर तक एक बहुत साफ भागता हुआ शोर होता रहा। सर्दियों में जब यह गाड़ी गुजरती है तब लोग एक प्रहर की खासी नींद ले चुके होते हैं। गर्मियों में साढ़े ग्यारह का कोई विशेष मतलब नहीं होता। यों उसके घर में सभी जल्दी सोया करते, जल्दी खाया और जल्दी उठा करते हैं।

आज बेहद गर्मी है। रास्ते-भर उसे जितने लोग मिले, उन सबने उससे गर्म और बेचैन कर देनेवाले मौसम की ही बात की। कपड़ों की फजीहत हो गई। बदहवासी, चिपचिपाहट और थकान है। अभी जब सवारी गाड़ी शोर करती हुई गुजरी, तो उसे ऐसा नहीं लगा कि नींद लगते-लगते टूट गई हो जैसा जाड़ों में प्रायः लगता है। बल्कि यों लगाकि अगर सोने की चेष्टा शुरू नहीं की गई तो सचमुच देर हो जाएगी। उसने जम्हाई ली, पंखे की हवा बहुत गर्म थी और वह पुराना होने की वजह से चिढ़ाती-सी आवाज भी कर रहा है। उसको लगा, दूसरे कमरों में भी लोग शायद उसकी ही तरह जम्हाइयाँ ले रहे होंगे। लेकिन दूसरे कमरों के पंखे पुराने नहीं हैं। उसने सोचना बंद करके अन्य कमरों की आहट लेनी चाही। उसे कोई बहुत मासूम-सी ध्वनि भी एक-डेढ़ मिनट तक नहीं सुनाई दी, जो सन्नाटे में काफी तेज होकर आ सकती हो।

तभी पिता की चारपाई बाहर चरमराई। वह किसी आहट से उठे होंगे। उन्होंने डाँटकर उस बिल्ली का रोना चुप कराया जो शुरू हो गया था। बिल्ली थोड़ी देर चुप रहकर फिर रोने लगी। अब पिता ने डंडे को गच पर कई बार पटका और उस दिशा की तरफ खदेड़नेवाले ढंग से दौड़े जिधर से रोना आ रहा था और 'हट्ट-हट्ट' चिल्लाए।

जब वह घूम-फिरकर लौट रहा था तो पिता अपना बिस्तर बाहर लगाकर बैठे थे। कनखी से उसने उन्हें अपनी गंजी से पीठ का पसीना रगड़ते हुए देखा और बचता हुआ वह घर के अंदर दाखिल हो गया। उसे लगा कि पिता को गर्मी की वजह से नींद नहीं आ रही है। लेकिन उसे इस स्थिति से रोष हुआ। सब लोग, पिता से अंदर पंखे के नीचे सोने के लिए कहा करते हैं, पर वह जरा भी नहीं सुनते। हमें क्या, भोगें कष्ट ! आगे पढ़ें

5 वर्ष पहले

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