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विजय जोशी 'शीतांशु' की  लघुकथा- खूँटे से बँधी

विजय जोशी 'शीतांशु' की  लघुकथा- खूँटे से बँधी
                
                                                         
                            उसे गाय नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि वह घास नहीं खाती। उसे देखकर नज़रों में एकाएक गाय का अक्स उभर जाता है। खूँटे से बँधी, उसे चरने के लिए बाहर जाने की इजाज़त नहीं है। खूँटे के सामने जो मिला, वही खाना है और जीवन पथ पर बिना खुरों के चलने पर मजबूर है।
                                                                 
                            
 
इस बछिया ने बचपन नहीं देखा। उसका ब्याहना और अधेड़ से बूढ़ी हो जाना, ऐसी घटनाओं में शुमार है जिसकी खबर आज तक गाँव के लोगों के साथ उसे भी नहीं मिली। हाँ, मगर इतना जरूर ध्यान  है कि कालान्तर में उसे अलग अलग संबोधनों से पुकारने वालों की संख्या बढ़ती गई थी।
  
जोरु, ववड़ी, लाड़ी, मुन्नी की माँ, मुन्ने की माँ, दादी और न जाने क्या क्या? इसके अलावा उसे कुछ और नहीं मालूम है। विश्वास न हो तो जाकर देख आओ। 
कहाँ?

अरे वहीं, उसके खूँटे पर। वहीं मिलेगी क्योंकि आज भी वह खूँटे के आसपास जो कुछ मिल जाता है उसी पर निर्भर है।
5 वर्ष पहले

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