विज्ञापन

अजेय की कविता: तपती पृथ्वी को प्रेम करना 

रत्नेश मिश्र

Irshaad
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  चाहता हूँ उड़ना 

पहुँच जाना अंतरिक्ष में 
एक ऐसी जगह 
जहाँ से दिखती हो पृथ्वी 
एक तपते चेहरे की तरह 
और पूछना उस से 
अब कैसा है दर्द ? 

चाहता हूँ दो आत्मीय बाहें उसकी 
और लपक कर गले मिलना
उसे थपथपाना कंधों के पास 
और कहना—
अपना खयाल रखना ! 
विज्ञापन

सोचता हूँ दो गतिशील पैर उस के
लेकिन सधे हुए ऐसे 
कि कुछ दूर तक छोड़ आएं 
मुझे इस विदाई की घड़ी में 
और बेआवाज़ एक ज़ुबान काँपती हुई 
जो कहना चाहती हो 
कि मेरी खबर लेते रहना ! 

इच्छा हुई है आज 
कि प्रेम करूँ गरमा गरम 
इस बीमार लड़्की के चेहरे सी पृथ्वी को 
पीते हुए उस के अंतस की मीठी भाप

बचा लूँ आँख भर उस की ज़िन्दा उजास 
इस से पहले कि कोई खींच ले जाए 
अज्ञात नक्षत्रों के ठण्डे बियावानों में उसे 
छू लूँ मिट्टी की खुश्बू दार त्वचा उसकी 
और पूछ लूँ उसी से 
कि इन छिटपुट चाहतों से बढ़ कर भला 
क्या है कोई रिश्ता 
पूरी ज़िन्दगी में -- 

चाहे वह पृथ्वी हो 
अथवा कोई भी प्रेमिका 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all