आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अजेय की कविता: तपती पृथ्वी को प्रेम करना 

अज्ञेय
                
                                                         
                            चाहता हूँ उड़ना 
                                                                 
                            

पहुँच जाना अंतरिक्ष में 
एक ऐसी जगह 
जहाँ से दिखती हो पृथ्वी 
एक तपते चेहरे की तरह 
और पूछना उस से 
अब कैसा है दर्द ? 

चाहता हूँ दो आत्मीय बाहें उसकी 
और लपक कर गले मिलना
उसे थपथपाना कंधों के पास 
और कहना—
अपना खयाल रखना !  आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर