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ए सोल्जर डायरी: कारगिल द इनसाइड स्टोरी

काव्य डेस्क

Book Review
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दिवंगत कवि सुदीप बनर्जी की एक कविता की पंक्ति है, 'जख्मों के कई नाम, उनमें एक लंदन'। वरिष्ठ पत्रकार हरिंदर बवेजा की कारगिल युद्ध पर दो दशक पहले आई किताब 'ए सोल्जर्स डायरी: कारगिल इनसाइड स्टोरी' को पढ़ते हुए कविता की यह पंक्तियां सहसा याद आ गईं, अन्यथा इसका कारगिल युद्ध से कोई संबंध नहीं है। कारगिल युद्ध को कवर करने वाले अनेक पत्रकारों ने उस दौर की वीरगाथा पर केंद्रित कई किताबें लिखी थीं, जो चर्चित भी रहीं। मगर बवेजा की यह किताब उन सबसे इस मायने में अलग थी कि इसके जरिये उन्होंने ऐसे अनछुए पहलुओं को सामने लाया था, जिनके बारे में शायद कभी पता ही नहीं चलता। हो सकता है कि उस युद्ध से संबंधित बहुत-सी आंतरिक रिपोर्ट्स आज भी किसी कोने में धूल खा रही हों। करीब दो दशक बाद इस किताब का नया संस्करण आया है, जिसे पढ़ना उस खतरनाक मंजर से गुजरने जैसा है, जिसमें हमारे सैनिकों को बेहद मुश्किल और दुष्कर लड़ाई लड़नी पड़ी थी।
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बवेजा ने यह किताब इस युद्ध में शिरकत करने वाले एक सैनिक की डायरी की शक्ल में लिखी थी, जो दरअसल बहुत से सैनिकों और सैन्य अधिकारियों के मिले-जुले अनुभवों और युद्ध में शामिल रहीं यूनिटों की ऑफ्टर एक्शन रिपोर्ट पर केंद्रित है। जब कारगिल-द्रास में घुसपैठियों की हलचल का पता चला, तो शुरू में इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया था। कहा गया, 'कुछ चूहे घुस आए हैं।’ जब तक यह पता चला कि यह पाकिस्तान समर्थित आतंकियों का दल नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना के ही लोग हैं, तब तक काफी देर हो चुकी थी। यहां तक की रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने कहा था कि 48 घंटे में घुसपैठियों को बेदखलकर दिया जाएगा। लेकिन युद्ध दो महीने से भी अधिक लंबा चला था। कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने विजय का परचम लहराया था, लेकिन उसे इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ी, जिसमें करीब पांच सौ जवान शहीद हो गए। मगर सबसे बड़ा सच यह है कि दहलीज पर आ गए दुश्मन के बारे में काफी देर से पता चला। सिर्फ तीन महीने पहले ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिलने बस लेकर लाहौर गए थे। तब न तो सरकार को और न ही भारतीय सेना के उच्च स्तर पर किसी को अंदाजा था कि पाकिस्तान ने कारगिल-द्रास में घुसकर पक्के बंकर बना लिए हैं। 

इससे भी दुखद यह है कि भारतीय जवानों के पास ढंग के हथियार, दूरबीन यहां तक कि बर्फीली पहाड़ियों पर चलने के लिए जरूरी जूते, दूरबीन, कंबल और स्लीपिंग बैग तक का अभाव था। उनके पास दुर्गम पहाड़ियों के पर्याप्त और अद्यतन नक्शे तक नहीं थे। इस डायरी ने हमारे बेहद मार्मिक क्षणों को भी दर्ज किया है। मोर्चे पर जाने की तैयारी कर रहे एक मेजर को खत मिलता है, बिना पढ़े ही वह उसे जेब में रख लेते हैं। अड़तालीस घंटे बाद वह शहीद हो जाते हैं। यह पत्र उनकी पत्नी का था! तथ्यों और ब्यौरों के साथ रोचक ढंग से लिखी गई इस डायरी में दर्ज ढाई हजार साल पहले प्राचीन चीनी युद्ध कला विशेषज्ञ सुन तुज की ये पंक्तियां भारतीय सेना के साथ ही देश के शीर्ष नेतृत्व के लिए आज भी सबक हैः 'यदि आप अपने शत्रु को जानते हैं और खुद को जानते हैं, तो फिर आपको सैकड़ों लड़ाइयों के परिणामों को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है। यदि आप खुद को तो जानते हैं, लेकिन अपने शत्रु को नहीं जानते, तब आपको हर जीत के बाद पराजय झेलनी पड़ेगी। यदि आप न शत्रु को जानते हैं और न ही खुद को, तब हर युद्ध के बाद आपका परास्त होना तय है।'

-सुदीप ठाकुर

किताब- ए सोल्जर डायरी: कारगिल  द इनसाइड स्टोरी
लेखिका - हरिंदर बवेजा
प्रकाशक - रोली बुक्स, नई दिल्ली
मूल्य - 395 रुपये
8 वर्ष पहले
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