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अब के गाओ तो गीत कोई कुछ ऐसा गाना

                
                                                         
                            अब के गाओ तो गीत कोई 
                                                                 
                            
कुछ ऐसा गाना 
कि हिन्दवी की हींग लगे।
तू का तड़का, 
तुम का नमक थोड़ा,
गिलौरी आप की मूंह में 
आप दबे।
जैसे घर के चूल्हे 
घर का खाना,
अब के गाओ तो 
गीत कोई 
कुछ ऐसा गाना।
 
कसे बदन सा एक बात पे सधा
गीत ना हो, 
जिहां एक बबाल प्यार का 
छिछोरा
जीत ना हो।
दो मुंहे बालों सा सरफिरा, 
चेहरे की झुर्रियों सा हज़ार 
हज़ार 
उल-फिजूल बातों का गीत 
सुनाना।   
अब के गाओ तो गीत 
कोई 
कुछ ऐसा गाना।
 
जो बरसों तलक रोज़ 
रोशनदानों 
से छनती आए, 
दीवारों की दरारों, गमलों,
राह किनारों, जिहां रुपे
उहाँ उगे ऐसा गीत।
यकायक कभी
चाय बनाते, आप बुदबुदाता 
गीत,
इकेला मन ओड़ सके 
जिसको, 
इकेले हाथ जिसकी अंगुली 
थामे 
शहर घूमे सके,
जिसके कंधे सर करके 
कोसों तलक 
जीवन की दिल्ली दीखे, 
जिसमें इलाहाबाद 
की गंगा का ठहराव हो, 
जिसका आँगन हो 
भले छोटा हो,
जिसमें उम्र के बाल 
पकें 
यादों की धीमी आंच पे।
 
उस द्वारे,  
बेसिर पैर का फैलता 
बेल लगाना 
अबके। 
 
सखि,
गाओ तो गीत कोई ऐसा गाना
 अबके। 

(परिकल्पना, लेखन और आवाज- अरविंद जोशी)
9 वर्ष पहले

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