वो छत भी गई सर से जो दुनिया थी हमारी
हम कौन सी दुनिया को बचाने में लगे थे
इस बरस उस से बिछड़ना था तो क्या क्या न हुआ
वर्ना कब इतनी मुलाक़ातें हुआ करती थीं
वही तो हो गए दुश्मन इक दिन
जिन की बातों में नहीं आए हम
रूठ कर हम भी भूल जाते हैं
दूसरा भी नहीं मनाता है
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