ग़ज़ल में कैसे ढालूं तुझको क़ातिल, सोचता हूं मैं,
तुझे महसूसना आसां है, मुश्किल सोचता हूं मैं ।
अगर मैं चाहूं भी, तो भी नहीं मिल पाएंगे हम-तुम,
भंवर मंझधार का तू है कि साहिल सोचता हूं मैं ।
क़ब्रगाहों का सफ़र ही कौंधता है मेरे ज़ेहन में,
वास्ते अपने, सुकूं की जब भी मंज़िल सोचता हूं मैं ।
मेरे मां - बाप, बीवी, बेटा - बेटी, सब परेशां हैं,
मोहल्ला भर मुझे कहता है जाहिल- सोचता हूं मैं ।
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