आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Rajesh Reddy Poetry: ख़ुद को समेटते हैं यहाँ से वहाँ से हम

उर्दू अदब
                
                                                         
                            अब क्या बताएँ टूटे हैं कितने कहाँ से हम 
                                                                 
                            
ख़ुद को समेटते हैं यहाँ से वहाँ से हम 

क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून 
नाराज़ हैं ज़मीं से ख़फ़ा आसमाँ से हम 

अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास 
लेने लगे हैं काम यक़ीं का गुमाँ से हम 

लेकिन हमारी आँखों ने कुछ और कह दिया 
कुछ और कहते रह गए अपनी ज़बाँ से हम 

आईने से उलझता है जब भी हमारा अक्स 
हट जाते हैं बचा के नज़र दरमियाँ से हम 

मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं 
ग़ाएब हुए हैं जब से तिरी दास्ताँ से हम 

ग़म बिक रहे थे मेले में ख़ुशियों के नाम पर 
मायूस हो के लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम 

2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर