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Nasir Kazmi Poetry: वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए, वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए

nasir kazmi poetry wo sahilon pe gaane wale kya huye wo kashtiyan chalaane wale kya huye
                
                                                         
                            

वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए
वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए

वो सुब्ह आते आते रह गई कहाँ
जो क़ाफ़िले थे आने वाले क्या हुए

मैं उन की राह देखता हूँ रात भर
वो रौशनी दिखाने वाले क्या हुए

ये कौन लोग हैं मिरे इधर उधर
वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए

वो दिल में खुबने वाली आँखें क्या हुईं
वो होंट मुस्कुराने वाले क्या हुए

इमारतें तो जल के राख हो गईं
इमारतें बनाने वाले क्या हुए

अकेले घर से पूछती है बे-कसी
तिरा दिया जलाने वाले क्या हुए

ये आप हम तो बोझ हैं ज़मीन का
ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए 

 
2 वर्ष पहले

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