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गुलज़ार: तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए

gulzar famous ghazal tujh ko dekha hai jo dariya ne idhar aate huye
                
                                                         
                            


तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए
कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए

हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा
छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए

मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी
शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए

हसरतें अपनी बिलखतीं न यतीमों की तरह
हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए

सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुन कर
मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए

43 मिनट पहले

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