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अमर उजाला काव्य विशेष: शख़्सियत में मिलिए इस बार उस्ताद राशिद ख़ान से

प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद राशिद खान
                
                                                                                 
                            जिनकी आवाज़ से फूल खिलते हैं, सुबह होती है और शाम अपना रंग बदलती है, जो अपनी आवाज़ को अपने पीर, अपने बुज़ुर्गों की इबादत का सिला मानते हैं, रामपुर सहसवान घराने के रोशन फ़नकार-उस्ताद राशिद ख़ान।
                                                                                                


उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे राशिद ख़ान अपने जन्मस्थान पर बहुत नहीं रहे, महज़ दस साल की उम्र में पहले मुंबई और फिर मुंबई से कोलकाता आ गए। यहां अपने बुजुर्गों के साए में और आइटीसी संगीत नाटक अकाजमी से शास्त्रीय संगीत की बाक़ायदा तालीम ली और दुनिया के बड़े-बड़े फ़नकारों के सामने, महज़ ग्यारह साल की उम्र में पहली प्रस्तुति दी। 

रियाज़ और मेहनत का यह सुरीला सिलसिला आगे बढ़ता रहा। सिला यह मिला कि एक दिन जब पंडित भीमसेन जोशी ने उन्हें सुना तो कहा कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को उसका भविष्य मिल गया। उत्साद राशिद कहते हैं कि गायकी का मुझे शुरू से ही शौक था और लगन भी। बाकी आज जो कुछ भी हूं अपने उस्तादों की वजह से हूं। उनके और अपनी लगन के कारण आज इस मुकाम को हासिल किया है। सभी घरानों से बहुत कुछ सीखने को मिला।

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मात्र 11 वर्ष की उम्र में अपना पहला लाइव कंसर्ट

3 years ago

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