आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शैल चतुर्वेदी की गुदगुदाती हुई कविता- मिल गया भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार पर शैल चतुर्वेदी की गुदगुदाती हुी कविता- मिल गया भ्रष्टाचार
                
                                                         
                            हमारे लाख मना करने पर भी
                                                                 
                            
हमारे घर के चक्कर काटता हुआ
मिल गया भ्रष्टाचार

हमने डांटा : नहीं मानोगे यार
तो बोला : चलिए 

आपने हमें यार तो कहा
अब आगे का काम
हम सम्भाल लेंगे
आप हमको पाल लीजिए
आपके बाल-बच्चों को
हम पाल लेंगे

हमने कहा : भ्रष्टाचार जी!
किसी नेता या अफ़सर के
बच्चे को पालना
और बात है
इन्सान के बच्चे को पालना
आसान नहीं है

वो बोला : जो वक्त के साथ नहीं चलता
इंसान नहीं है

मैं आज का वक्त हूँ
कलयुग की धमनियों में
बहता हुआ रक्त हूँ
कहने को काला हूँ
मगर मेरे कई रंग हैं
दहेज़, बेरोज़गारी
हड़ताल और दंगे
मेरे ही बीस सूत्री कार्यक्रम के अंग हैं

मेरे ही इशारे पर
रात में हुस्न नाचता है
और दिन में
पंडित रामायण बांचता है

मैं जिसके साथ हूँ
वह हर कानून तोड़ सकता है
अदालत की कुर्सी का चेहरा
चाहे जिस ओर मोड़ सकता है

उसके आंगन में
अंगड़ाई लेती है
गुलाबी रात
और दरवाज़े पर दस्तक देती है
सुनहरी भोर
आगे पढ़ें

7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर