तुम दिखीं
मेरे जीवन के ऐसे अंतराल में,
जब मुट्ठी भर स्वप्न
सिमटे थे आँखों के उजले खयाल में।
हृदय के गलीचे पर
मधुवासंती की भीनी महक बनकर,
तुम उतरीं चुपके से
मन के सूने आँगन में बहककर।
लावण्य की उजली आभा,
नयनों में प्रेम का कोमल स्पर्श—
तुम्हारी एक चितवन ने
छीन लिया मुझसे
शब्दों का सारा हर्ष।
जो अधर कल तक
बातों से भरे रहते थे,
तुम्हें देखते ही
न जाने क्यों
मौन खड़े रह गए।
मानो शब्दों की राहों पर
अचानक कोई कर्फ्यू उतर आया,
और मेरे भीतर का शोर
तुम्हारी आँखों में
चुपचाप समा गया।
मैं निहारता रहा तुम्हें,
तुम्हें पाने की चाह लिए;
फिर हाथ बढ़ा दिया
उस स्वप्निल संसार की ओर,
जहाँ तुम थीं—
और मेरी हर राह
तुम तक जाती थी।
चल पड़ा तुम्हारे साथ
उन अनंत पगडंडियों पर,
जहाँ मंज़िल की चिंता नहीं,
बस तुम्हारा साथ हो
हर मोड़, हर सफ़र पर।
मन ने चाहा—
प्रेम का एक रम्य नगर बसाएँ,
जहाँ नदी की कल-कल में
हम अपने गीत सुनाएँ।
जहाँ मलय पवन
तुम्हारी खुशबू लेकर आए,
और निझुम रात की निस्तब्धता
हम दोनों के लिए
प्रीत की रागिनी गाए।
चाँदनी की रुपहली छाँव में
तुम मेरे पास रहो,
मैं कुछ कहूँ भी न—
बस तुम्हें देखता रहूँ,
और यह पल
यहीं ठहर जाए।
तुम्हारे रूप-लावण्य को
नयनों में भरता रहूँ,
और हर धड़कन के संग
तुम्हें थोड़ा-थोड़ा
लिखता रहूँ।
फिर मेरी कलम
एक नया अध्याय रचे—
जहाँ शब्द कम हों,
पर एहसास गहरे;
जहाँ मौन भी बोले
और आँखें सब कुछ कहें।
तुम रहो
मेरे स्वप्नों की नायिका,
मेरी कल्पनाओं की रागिनी;
और मैं लिखता रहूँ
तुम्हारे नाम से
प्रेम की वह कहानी—
जिसमें न कोई अंत हो,
न कोई विराम;
बस तुम रहो...
तुम्हारा एहसास रहे...
और धड़कता रहे
हमारे प्रेम का नाम।
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