'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अर्चा, जिसका अर्थ है- पूजा, प्रतिमा। प्रस्तुत है जानकीवल्लभ शास्त्री की कविता- यह पीर पुरानी हो !
यह पीर पुरानी हो !
मत रहो हाय, मैं, जग में मेरी एक कहानी हो।
मैं चलता चलूँ निरन्तर अन्तर में विश्वास भरे,
इन सूखी-सूखी आँखों में, तेरी ही प्यास भरे,
मत पहुँचु तुझ तक, पथ में मेरी चरण-निशानी हो।
दूँ लगा आग अपने हाँथों, मिट्टी का गेह जले,
पल भर प्रदीप में तेरे मेरा भी तो स्नेह जले,
जल जाये मेरा सत्य, अमर मेरी नादानी हो।
वह काम करूँ ही नहीं, न हो जिससे तेरी अर्चा,
वह बात सुनूँ ही नहीं, न हो जिसमें तेरी चर्चा,
जग उँगली उठा कहे : कोई ऐसा अभिमानी हो।
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