भारतीय संविधान में हिन्दी को कार्यालयी भाषा का दर्जा दिया गया है। भारत में करोड़ों लोगों की मातृभाषा हिन्दी है। इससे कई गुणा अधिक लोग इसे द्वितीय भाषा के रूप में समझते और प्रयोग करते हैं। भारत के बाहर जहाँ भी भारतीय है उनमें से अधिकांश लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं। उनमें से कई लोग लिखते हैं, साहित्य रचते हैं और प्रवासी साहित्य के अंतर्गत पठन-पाठन, शोध की सामग्रे बनते हैं। बहुत से विदेशी भी हिन्दी का प्रयोग करते हैं। दुनिया की भाषाओं में बोलने वालों की संख्या के आधार पर हिन्दी तीसरा स्थान रखती है। बोलने वालों से कई गुणा अधिक इसे समझने वालों की संख्या है। भारत के बाहर यह नेपाल, दक्षिण अफ़्रीका, मॉरीशस, येमन, अमेरिका, इंग्लैंड, युगांडा, जर्मनी, न्यू ज़ीलैंड, सिंगापुर, खाड़ी के देशों, कनाडा आदि तमाम देशों में प्रयोग की जाती है। दुनिया के 12 विश्वविद्यालयों में इसके पठन-पाठन की व्यवस्था है।
आज गिरमिटिया प्रवासी भारतीय देशों के अलावा रूस, चीन, जापान, इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, इटली, फ़्रांस, चेकोस्लोवाकिया, रोमानिया, बल्गारिया, पोलैंड, हंगरी, ऑस्ट्रिया आदि देशों में भी हिन्दी का पठन-पाठन, हिन्दी भाषा-साहित्य पर शोधकार्य हो रहा है। इसमें सरकार की भूमिका है, विश्व हिन्दी सचिवालय (मॉरीशस) भूमिका निभा रहा है और सर्वाधिक योगदान स्वयंसेवी संस्थाओं यथा मंदिरों का है। हिन्दी जानने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। यह लिंक भाषा है और लोगों के बीच भावात्मक संबंध स्थापित करती है।
भारत के अधिकांश लोग तथा भारत के बाहर भारतवंशी लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना हाहिए। लेकिन बहुत पहले से विदेशियों ने भी हिन्दी सीखी और उसका प्रयोग-उपयोग किया। इसके कारण रहे हैं। सदियों से अपने अनोखेपन के कारण भारत दुनिया के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। इसका ऐतिहासिक महत्व, व्यापारिक प्रसार, भौतिक संवृद्धि, दार्शनिक संपदा ने विश्व को आकर्षित किया है। मुगल आए और उसमें से कई लूट कर वापस अपने स्थान को लौट गए, कई यहीं बस गए। बसे हुए यहाँ की भाषा संस्कृति में रच-पग गए। कोलम्बस असल में सोने की चिड़िया भारत को खोजता हुआ अमेरिका के तट पर जा लगा। हॉलैंड, डेनमार्क, पुर्तगाल, फ़्रांस के लोग इसे ही ढूँढ़ते हुए आए। ब्रिटेन के लोग व्यापार करने यहाँ आए और अंतत: इस देश पर राज करने लगे। बाहर से आने वाले यूरोपीय लोगों के लिए आवश्यक था कि वे यहाँ के बहुसंख्यक लोगों की भाषा हिन्दी जाने-सीखें, इसका प्रयोग करें। अत: इन लोगों ने कामचलाऊ हिन्दी सीखी।
हिन्दी को आज हम वैश्विक भाषा का दर्जा देते हैं और आज विश्व दिन्दी दिवस मना रहे हैं। मगर यह जान कर सुखद आश्चर्य होता है कि हिन्दी भाषा का पहला व्याकरण एक डच विद्वान केटलर ने लिखा था। पहले-पहल हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने वाले फ़्रांसिसी विद्वान गार्सिन द टैसी थे और पहली बार हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण का श्रेय अंग्रज सर जॉर्ज एब्राहम ग्रियसन को जाता है। और-तो-और हिन्दी में शोध कार्य ‘द थियोलॉजी ऑफ़ तुलसीदास’ पहले-पहल एक इंग्लिश शोधकर्ता जे. आर. कार्पेंटर ने लंदन यूनिवर्सिटी में प्रस्तुत किया था। यह सर्वविदित है कि बुनियादी हिन्दी शिक्षण विधि की पाठ्य-पुस्तक की रचना जॉन गिलक्राइस्ट ने की थी। है न हिन्दी शुरु से वैश्विक भाषा!
विश्व में आज हमें तरह-तरह की हिन्दी देखने, पढ़ने और सुनने को मिलती है। भारत में ही हिन्दी की तकरीबन 17 उपबोलियाँ प्राप्त होती हैं। इन उपभाषाओं की अपनी स्थानीयता है, अपनी भिन्न शैली है। भाषा पर्यावरण का हिस्सा है। साहित्य का आधार होती है भाषा। व्यक्ति अपने परिवेश से भाषा ग्रहण करता है। अत: प्रवासियों की हिन्दी और भारत के विभिन्न प्रांतों में बोली जाने वाली हिन्दी बहुरंगी है। चूंकि प्रवासी अपना देश छोड़ कर दूसरे देश में बसा होता है अत: उस पर दो परिवेश का प्रभाव होता है। इसीलिए प्रवासी की भाषा में परिवर्तन स्वाभाविक है। उत्तरोत्तर उसकी भाषा में परिवर्तन होता है। परिवेश भाषा को कैसे प्रभावित करता है, इसे जानें-समझें। लेकिन परिवेश से भाषा की गुणवत्ता पर प्रभाव नहीं पड़ता है, नहीं पड़ना चाहिए।
इसीलिए गर्म प्रदेश और शीत प्रदेश की भाषा में फ़र्क होता है। रेतीले प्रदेश की हिन्दी और तटीय प्रदेश की हिन्दी भिन्न है। अमीर-गरीब समाज की हिन्दी भाषा भिन्न होती हैं। समाज में यदि धर्म प्रमुख है तो वह भाषा में भी आता है। समाज का सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक वातावरण भाषा को तय करता है। मॉरीशस, फ़ीजी, त्रिनिदाद का निवासी उसी हिन्दी का प्रयोग नहीं करता है, जिस हिन्दी का प्रयोग भारत में रहने वाला करता है। इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा के लोग फ़िजी के लोगों की तरह हिन्दी नहीं बोलते हैं। खाड़ी के देशों में रहने वाले भिन्न हिन्दी का प्रयोग करते हैं। क्योंकि प्रवासियों के अनुभव का हिस्सा अब दो भिन्न पर्यावरण यानि भारत और विदेश का पर्यावरण है।
दिव्या माथुर और तेजेंद्र शर्मा जैसे प्रवासी लेखकों की भाषा भारत के लेखकों से भिन्न है क्योंकि भारत में अफ़्रीकी गुंडे कदाचित ही मिलते हैं जैसे दिव्या माथुर की कहानी में मिलते हैं। और न भारत में अभी लंदन जैसी रेल चलती हैं, न ही ओवरफ़्लो पार्किंग होती है, जैसा जानेमाने कहानीकार तेजेंद्र शर्मा अपनी कहानियों में दिखाते हैं। खाड़ी के देश जा कर भारतीय को पूरा परिवेश अजनबी लगता है और वह धीरे-धीरे वहाँ की भाषा के शब्द अपनी हिन्दी में पिरोने लगता है। उसके लिए नातूर, रवाब, अबाया सामान्य शब्द हैं, जिन्हें कहानीकार-संपादक कृष्ण बिहारी का ‘नातूर’ कहानी का खान अपनी अटपटी हिन्दी में प्रयोग करता है।
हिन्दी में लिखने वाले भारतीय प्रवासी विभिन्न मातृभाषा पृष्ठभूमि से आते हैं। उनकी मातृभाषा पंजाबी (सुषम बेदी, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, गौतम सचदेव, तेजेंद्र शर्मा), कैथी (दिव्या माथुर), अश्विन गाँधी, अंजना संधीर (गुजराती) आदि है। अत: उनके लिखे में इन भाषाओं के शब्द, मुहावरे, कहावतें आना बहुत सामान्य बात है। भाषा का लेन-देन चलता रहता है। साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गोपीचंद नारंग कहते हैं, ‘बाहर के देशों की दूसरी भाषाओं से हिन्दी ग्रहण भी कर रही है और एक डायलैक्टल संबंध उनको दे भी रही है। इससे उसके अंदर एक नया रंग-रूप आ रहा है।’
प्रवासियों के यहाँ कुछ अजीब शब्दों का प्रयोग मिलता है, जैसे संभ्रमित पेड़, कारों का रुकना निषिद्ध, आदि। इसी तरह हिन्दी का मुहावरा है, ‘न होगा बाँस न बजेगी बाँसुरी’ मगर दिव्या माथुर ने उसे ‘न होगी भैंस न बजेगी बाँसुरी’ बना दिया है असल में हिन्दी का ही एक अन्य मुहावरा है, भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस बैठी पगुराए। कहानीकार ने दोनों का घालमेल कर दिया है। अक्सर प्रवासी कहानीकार हिन्दी के मौखिक और लिखित प्रयोगात्मक रूप दूर रहते हैं अत: इस तरह की भूल की संभावना बनी रहती है। इसी कहानी में दिव्या माथुर ने इंग्लिश मुहावरे का हिन्दीकरण किया है, ‘स्वीपिंग अंडर द कार्पेट’ को ‘चटाई के नीचे छिपाना’ लिखा है। हम जिस देश, जिस वातावरण में रहते हैं, वहाँ की भाषा जाने-अनजाने हमारे प्रयोग में आ ही जाती है और लेखक जब लिखता है तो यह उसके लेखन में भी आती है। उनकी कहानी ‘ठुल्ला किलब’ उनके अनुसार दिल्ली के कायस्थों की भाषा में रची गई है जो उनकी पृष्ठभूमि को दर्शाती है।
इसी तरह जैसे मैंने एक विचित्र प्रयोग सुना, ‘ने चाय की एक चुस्की ली तो दिमाग में चैन सा बिखर गया।’ चैन सिमटता है, सिमटाता है, चैन के साथ बिखरना थोड़ा अटपटा प्रयोग है। आगे एक और वाक्य सुना, ‘पारंपरिक चेतना का विदेशीकरण’, यह अच्छा है और यह प्रवासी की मानसिकता का चित्रण करने के लिए अनूकूल भी है। इस तरह हम सुदूर देश से मुखरित हिन्दी भाषा, प्रवासी की हिन्दी भाषा में संवेदना की भाषा देख सकते हैं। भारत में ही जब एक पंजाबी हिन्दी बोलता है और जब एक केरल वाला हिन्दी का प्रयोग करता है तो दोनों के लहजे में बहुत फ़र्क होता है।
लेकिन जब सोची-समझी साजिश के तहत भाषा को तोड़ा-मरोड़ा जाता है तो बड़ा अटपटा लगता है। यह मात्र अटपटा ही नहीं है एक तरह का अपराध है। भाषा हथियार है। यह जोड़ने और तोड़ने दोनों का काम करती है। जब जानबूझ कर हिन्दी भाषा के साथ खिलवाड़ किया जाता है तो मेरे जैसे हिन्दी प्रेमी कराह उठते हैं। मुझमें समाहित हिन्दी दर्द से बिलबिला उठती है। वह कहती है,
‘उफ़! कितनी तकलीफ़ होती है जब मेरी बहन मुझ पर थोपी जाती है। या मेरी माँ के शब्दों तले मैं कराहती हूँ। या फ़िर वेदेशी भाषा को बीच में घुसा कर मेरी खिचड़ी बनाई जाती है। नहीं समझे न मेरी बात? कैसे समझेंगे? मेरे साथ बैठेगें तब तो मेरा दर्द पता चलेगा। वैसे देखते-सुनते तो प्रतिदिन हो। टीवी पर जब एंकर चीख-चीख कर कहता है भारी ‘मशक्कत’ के बाद अपराधी पकड़ा गया तो दर्शक को मशक्कत को समझने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। जब तक वे मशक्कत का अर्थ जान पाते हैं तब तक एंकर ‘तफ़्तीश’ में जुट जाता है। तफ़्तीश के लिए पुलिस ‘क्लू’ खोजने निकलती है तो दर्शक ‘शख्स’ को आदमी में बदल कर वाक्य का मतलब जानने की कोशिश करने लगता है। इसी बीच सड़क पर एक ट्रक और एक कार का ‘हेड ऑन कोलिशन’ हो जाता है और घायलों का ‘रेस्क्यू ऑपरेशन’ शुरु हो जाता है
-सोच रही हूँ, क्या मशक्कत, तफ़्तीश, क्लू, हेड ऑन कोलिशन, रेस्क्यू के लिए मेरे पास कोई सरल शब्द नहीं है? अरे, अरे! अब कम्प्यूटर, कैल्कूलेटर, एयरकंडिशनर के लिए संस्कृत शब्दकोष मत खंगालने लगिएगा, वरना मेरा दम फ़िर घुटने लगेगा। न ही अनुवाद के लिए गूगल का सहारा लीजिएगा। प्रवाह में आए विदेशी शब्दों को बिना रोक-टोक आने दें।
साल में एक दिन विश्व हिन्दी दिवस मना कर मेरे लिए छाती कूटना बंद कीजिए और बाकी के 365 दिन भी मेरा सही प्रयोग कीजिए। मैं इतनी कठिन नहीं हूँ कि अन्य भाषा के सहारे से मुझे सरल (!?) बनाने की आवश्यकता हो, न ही इतनी लाचार हूँ कि दूसरी भाषा की बैसाखी ले कर चलूँ।’
हिन्दी के विस्तार में तकनीकि की महत्वपूर्ण भूमिका है। अब मोबाइल, कम्प्युटर पर हिन्दी लिखना-पढ़ना सुलभ है। व्यापार भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार का एक मुख्य कारण प्रारंभ से रहा है। और हिन्दी फ़िल्मों की भूमिका से कैसे इंकार किया जा सकता है। भारत के अहिन्दी भाषियों तथा विदेश में हिन्दी की लोकप्रियता का एक सशक्त माध्यम हिन्दी फ़िल्में हैं। हिन्दी के प्रभाव का नतीजा है अन्य भाषाओं तथा विदेशी फ़िल्में अब सबटाइटिल्स तथा डबिंग में उपलब्ध हैं, जिनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। टीवी ने भी इसमें सहयोग किया है, रामानंद सागर के ‘रामायण’ तथा बी. आर. चोपड़ा के ‘महाभारत’ की लोकप्रियता जगजाहिर है। इनका पुनर्प्रकाशन प्रारंभ हुआ है। हिन्दी के कार्यक्रम रेडियो पर देश-विदेश में सुने जाते हैं, खासकर हिन्दी फ़िल्मी गीत। यूट्यूब तो हिन्दी गीत-संगीत का खजाना है।
हिन्दी के विश्व भाषा दिवस को मनाने का एक उत्तम तरीका हो सकता है हम हिन्दी भाषी लोग अपने बच्चों से हिन्दी में बात करें, उन्हें हिन्दी बोलने-पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न पत्र हिन्दी में भी हों और हिन्दी भाषा तथा हिन्दी साहित्य से जुड़े भी हों। हम स्वयं हिन्दी को सम्मान देंगे तभी सच्चे अर्थों में उसे विश्व भाषा का दर्जा दिया जा सकेगा। विश्व हिन्दी दिवस मनाना सार्थक होगा। आज के विशेष अवसर पर न केवल हिन्दी भाषियों वरन सबको शुभकामनाएँ!
- डॉ. विजय शर्मा
जमशेदपुर 831009
ईमेल: vijshain@gmail.com
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4 वर्ष पहले
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