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Mauni Amavasya 2023: कैलाश गौतम की सुप्रसिद्ध रचना- अमौसा नहाये चलल गाँव देखा

साहित्य
                
                                                         
                            कैलाश गौतम की रचनाएं वस्तुतः समय के सच को रेखांकित करते हुए, चुनौतियों में जूझते हुए आम जनमानस की ही आवाज हैं ! लोकबोली की मिठास के साथ ही तीज-त्योहारों हंसी- ख़ुशी और पनप रहा फीकापन भी है। महंगाई की मार है तो रिश्तों की मिठास-खटास भी। हर साल इलाहाबाद में कुंभ का आयोजन होता है और दूर-दूर से लोग गंगा स्नान के लिए प्रयाग आते हैं। कैसे-कैसे लोग आते हैं, आने की तैयारी से लेकर घर वापसी तक, रेलवे स्टेशन की भीड़, मेले का उत्साह, भूले-बिछुड़े लोगों का मेले में मिलन इत्यादि का इस कविता में बहुत रोचक वर्णन है।  
                                                                 
                            

भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा, 
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा 
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा, 
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा 


भावार्थ:- भक्ति और धर्म में मशगूल होकर गांव भर के लोग अमौसा नहाने (कुंभ स्नान) चल चुके हैं।  

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, 
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा 
कमरी में केहू, कथरी में केहू, 
रजाई में केहू, दुलाई में केहू 


भावार्थ:- इस हाथ में भी झोला, उस हाथ में भी झोला है, कंधे पर बोरी, सर पर बोरा, कोई कथरी में है तो कोई रजाई में।  

आजी रँगावत रही गोड़ देखा, 
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखा 
घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया, 
गठरिया में अब का रखाई बतईहा 


भावार्थ:- दादी तैयारी में हैं और पैर में रंग लगवा रही हैं, दादा देखकर हंस रहे हैं, घूंघट के अंदर से बहू पूछ रही है कि गठरी में और क्या क्या रखें। 

एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी,
रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी
चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी,
नयका चपलवा अचारे का ओरी

अमौसा के मेला, अमौसा के मेला


भावार्थ:- बता रही है कि इधर साड़ी है, दूसरी तरफ पूरी, रामायण और ढूंढ़ी भी है, किनारे की तरफ चावल और पोहा है।

(इस गठरी और इस व्यवस्था के साथ गाँव का आदमी जब गाँव के बाहर रेलवे स्टेशन पर आता है तब क्या स्थिति होती है ?)

मचल हउवे हल्ला, चढ़ावा उतारा,
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा 
एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लुर्री-लुर्रा,
आ बीचे में हउव शराफत से बोला

भावार्थ:-
हल्ला गुल्ला बहुत है, रेल खचाखच भरी हुई है, लोग एक दूसरे से लड़ते-भिड़ते आगे बड़ रहे हैं और बोल रहे हैं कि शराफत से बोलो। 

चपायल ह केहु, दबायल ह केहू,
घंटन से उपर टँगायल ह केहू
केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर,
केहू फनफनात हउवे कीरा के नियर

भावार्थ:-
कोई दबा हुआ है, कोई कई लोगों के बीच में चंप गया है, कोई घंटों से ऊपर टंगा हुआ है, कोई हक्का-बक्का है, कोई सांप की तरह फनफना रहा है।

बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया,
तनी हम्मे आगे बढ़े देता भईया
मगर केहू दर से टसकले ना टसके,
टसकले ना टसके, मसकले ना मसके,

भावार्थ:-
बाप रे बाप ! जरा हमको आगे बढ़ने देते भईया, लेकिन कोई अपनी जगह से खिसक नहीं रहा है। 

छिड़ल हौ हिताई-मिताई के चरचा,
पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा
दरोगा के बदली करावत हौ केहू,
लग्गी से पानी पियावत हौ केहू
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला

भावार्थ:-
सभी आपस में गप्पे लड़ा रहे हैं, कोई नाते-रिश्तेदारी की चर्चा कर रहा है, कोई पढ़ाई लिखाई की तो बढ़-बढ़ के बोल रहा है कि दरोगा की बदली करवा देंगे। यही अमौसा के मेले का असली रंग है। 

(इसी भीड़ में गाँव का नवविवाहित जोड़ा भी आया हुआ है। उसकी गति से उसकी अवस्था की जानकारी हो जाती है बाकी आप आगे देखिये…)

गुलब्बन के दुलहिन चलैं धीरे-धीरे
भरल नाव जइसे नदी तीरे-तीरे
सजल देहि जइसे हो गवने के डोली,
हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली

भावार्थ:-
गुलब्बन की दूल्हन धीरे-धीरे चल रही है, जैसे भरी हुई नाव नदी के किनारे-किनारे चलती है। ऐसी सजी हुई है जैसे बिदाई की डोली तैयार खड़ी हो, हंसी है बताशा और बातें शहद जैसी मीठी। 

देखैं ली ठोकर बचावेली धक्का,
मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का
फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के
निहारे ली मेला सिहा के चिहा के

भावार्थ:-
कहीं ठोंकर या धक्का न लग जाय इसलिए बचा के चलती है, मन में प्रसन्नता की फुलझड़ियां फूट रही हैं। मुस्कुरा-मुस्कराकर मेले को तकती रहती है। 

सबै देवी देवता मनावत चलेली,
नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली
किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं
कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं

भावार्थ:-
सभी देवी-देवता को मनाते हुए चलती है, हर जगह नारियल चढ़ाते हुए, किनारे से देखती है और इशारे बोलती है। 

बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करे ली
आ दुधै से शिवजी के अरघा भरे ली
चढ़ावें चढ़ावा आ कोठर शिवाला
छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला

अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.
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3 वर्ष पहले

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