कैलाश गौतम की रचनाएं वस्तुतः समय के सच को रेखांकित करते हुए, चुनौतियों में जूझते हुए आम जनमानस की ही आवाज हैं ! लोकबोली की मिठास के साथ ही तीज-त्योहारों हंसी- ख़ुशी और पनप रहा फीकापन भी है। महंगाई की मार है तो रिश्तों की मिठास-खटास भी। हर साल इलाहाबाद में कुंभ का आयोजन होता है और दूर-दूर से लोग गंगा स्नान के लिए प्रयाग आते हैं। कैसे-कैसे लोग आते हैं, आने की तैयारी से लेकर घर वापसी तक, रेलवे स्टेशन की भीड़, मेले का उत्साह, भूले-बिछुड़े लोगों का मेले में मिलन इत्यादि का इस कविता में बहुत रोचक वर्णन है।
भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा,
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा
भावार्थ:- भक्ति और धर्म में मशगूल होकर गांव भर के लोग अमौसा नहाने (कुंभ स्नान) चल चुके हैं।
एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा,
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा
कमरी में केहू, कथरी में केहू,
रजाई में केहू, दुलाई में केहू
भावार्थ:- इस हाथ में भी झोला, उस हाथ में भी झोला है, कंधे पर बोरी, सर पर बोरा, कोई कथरी में है तो कोई रजाई में।
आजी रँगावत रही गोड़ देखा,
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखा
घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया,
गठरिया में अब का रखाई बतईहा
भावार्थ:- दादी तैयारी में हैं और पैर में रंग लगवा रही हैं, दादा देखकर हंस रहे हैं, घूंघट के अंदर से बहू पूछ रही है कि गठरी में और क्या क्या रखें।
एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी,
रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी
चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी,
नयका चपलवा अचारे का ओरी
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला
भावार्थ:- बता रही है कि इधर साड़ी है, दूसरी तरफ पूरी, रामायण और ढूंढ़ी भी है, किनारे की तरफ चावल और पोहा है।
(इस गठरी और इस व्यवस्था के साथ गाँव का आदमी जब गाँव के बाहर रेलवे स्टेशन पर आता है तब क्या स्थिति होती है ?)
मचल हउवे हल्ला, चढ़ावा उतारा,
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा
एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लुर्री-लुर्रा,
आ बीचे में हउव शराफत से बोला
भावार्थ:- हल्ला गुल्ला बहुत है, रेल खचाखच भरी हुई है, लोग एक दूसरे से लड़ते-भिड़ते आगे बड़ रहे हैं और बोल रहे हैं कि शराफत से बोलो।
चपायल ह केहु, दबायल ह केहू,
घंटन से उपर टँगायल ह केहू
केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर,
केहू फनफनात हउवे कीरा के नियर
भावार्थ:- कोई दबा हुआ है, कोई कई लोगों के बीच में चंप गया है, कोई घंटों से ऊपर टंगा हुआ है, कोई हक्का-बक्का है, कोई सांप की तरह फनफना रहा है।
बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया,
तनी हम्मे आगे बढ़े देता भईया
मगर केहू दर से टसकले ना टसके,
टसकले ना टसके, मसकले ना मसके,
भावार्थ:- बाप रे बाप ! जरा हमको आगे बढ़ने देते भईया, लेकिन कोई अपनी जगह से खिसक नहीं रहा है।
छिड़ल हौ हिताई-मिताई के चरचा,
पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा
दरोगा के बदली करावत हौ केहू,
लग्गी से पानी पियावत हौ केहू
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला
भावार्थ:- सभी आपस में गप्पे लड़ा रहे हैं, कोई नाते-रिश्तेदारी की चर्चा कर रहा है, कोई पढ़ाई लिखाई की तो बढ़-बढ़ के बोल रहा है कि दरोगा की बदली करवा देंगे। यही अमौसा के मेले का असली रंग है।
(इसी भीड़ में गाँव का नवविवाहित जोड़ा भी आया हुआ है। उसकी गति से उसकी अवस्था की जानकारी हो जाती है बाकी आप आगे देखिये…)
गुलब्बन के दुलहिन चलैं धीरे-धीरे
भरल नाव जइसे नदी तीरे-तीरे
सजल देहि जइसे हो गवने के डोली,
हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली
भावार्थ:- गुलब्बन की दूल्हन धीरे-धीरे चल रही है, जैसे भरी हुई नाव नदी के किनारे-किनारे चलती है। ऐसी सजी हुई है जैसे बिदाई की डोली तैयार खड़ी हो, हंसी है बताशा और बातें शहद जैसी मीठी।
देखैं ली ठोकर बचावेली धक्का,
मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का
फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के
निहारे ली मेला सिहा के चिहा के
भावार्थ:- कहीं ठोंकर या धक्का न लग जाय इसलिए बचा के चलती है, मन में प्रसन्नता की फुलझड़ियां फूट रही हैं। मुस्कुरा-मुस्कराकर मेले को तकती रहती है।
सबै देवी देवता मनावत चलेली,
नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली
किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं
कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं
भावार्थ:- सभी देवी-देवता को मनाते हुए चलती है, हर जगह नारियल चढ़ाते हुए, किनारे से देखती है और इशारे बोलती है।
बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करे ली
आ दुधै से शिवजी के अरघा भरे ली
चढ़ावें चढ़ावा आ कोठर शिवाला
छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.
(इसी भीड़ में गाँव की दो लड़कियां, शादी वादी हो जाती है, बाल-बच्चेदार हो जाती हैं, लगभग दस बारह बरसों के बाद मिलती हैं। वे आपस में क्या बतियाती हैं …)
एही में चम्पा-चमेली भेंटइली
बचपन के दुनो सहेली भेंटइली
ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें,
दुनो आपन गहना-गदेला गिनावें
भावार्थ:- चंपा-चमेली बचपन की सहेलियां हैं, बहुत दिनों पर मेले में मिल गई हैं। दोनों अपना-अपना सुनाती हैं, किसके पास कितना गहना है, कितने बच्चे हैं।
असो का बनवलू, असो का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो ना अब तक पठवलू
ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं,
दुनो अपना दुलहा के तारीफ झोंकैं
भावार्थ:- दोनों एक-दूसरे से बात कर रही हैं कि- ये बनवा ली, वो बनवा ली लेकिन अभी तक जीजा जी की तस्वीर नहीं भेजी। दोनों एक-दूसरे को ना तो रोक रही हैं, ना टोंक रही हैं, दोनों ही अपने-अपने दूल्हे की तारीफ किए जा रही हैं।
हमैं अपना सासु के पुतरी तू जाना
हमैं ससुरजी के पगड़ी तू जाना
शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की
चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की
भावार्थ:- और बातें क्या हो रही हैं.....एक कहती है कि मुझे अपने सास की आंख की पुतली तुम समझो, तो दूसरी कहती है कि मुझे अपने ससुर जी की पगड़ी समझना। शहर में भी पक्का मकान, देहात में भी पक्का मकान। चक्की भी चल रही है, टेंपो भी चल रहे हैं।
मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो
भयल तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो
साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं
हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला
भावार्थ:- थोड़ी देर बाद मन ही मन में दोनों को इर्ष्या पैदा हो गई, तू तू, मैं-मैं शुरू हो गई, दोनों लड़ने लगीं। साधू-संत और सिपाही ऐसे छुड़ा रहे हैं जैसे हलवाई अपने कड़ाही को छुड़ाता है।
(कैलाश जी यह कविता पढ़ते हुए अक्सर इस बात का जिक्र किया करते थे- कभी-कभी बड़ी-बड़ी दुर्घटनायें हो जाती हैं। दो तीन घटनाओं में मैं खुद शामिल रहा, चाहे वो हरिद्वार का कुंभ हो, चाहे वो नासिक का कुंभ रहा हो। सन 54 के कुंभ में इलाहाबाद में ही कई हजार लोग मरे। मैंने कई छोटी-छोटी घटनाओं को पकड़ा। जहाँ जिन्दगी है, मौत नहीं है। हँसी है दुख नहीं है...)
कलौता के माई के झोरा हेराइल
बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल
टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहैं
बिजुरिया के माई बिजुरिया के जोहैं
भावार्थ:- कलौता की मां का झोला कहीं खो गया है और बुद्धू का बड़ा वाला कटोरा खो गया है। टिकुलिया की मां टिकुली का और बिजरी का मां, बिजरी का इंतजार कर रही है।
मचल हउवै हल्ला त सगरो ढुंढाई
चमेला के बाबू चमेला के माई
गुलबिया सभत्तर निहारत चले ले
मुरहुआ मुरहुआ पुकारत चले ले
छोटकी बिटउआ के मारत चले ले
बिटिइउवे पे गुस्सा उतारत चले ले
गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइलीं
गोबरधन का संगे पँउड़ के नहइली
घरे चलतऽ पाहुन दही गुड़ खिआइत
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइत
उहैं फेंक गठरी, परइले गोबरधन,
ना फिर फिर देखइले धरइले गोबरधन
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला
भावार्थ:- गोबरधन की सरहज से उनकी मुलाकात किनारे पर हो गई, दोनों गंगा जी में खूब तैरकर नहाए। सरहज ने कहा कि मेहमान जी ! आप घर चलते तो दही और गुड़ खिलाते, भतीजा पैदा हुआ है, उसे भी दिखाते। इतना सुनते ही गठरी फेंक कर गोबरधन चले भाग और दोबारा नहीं दिखाई दिए।
(अन्तिम पंक्तियाँ हैं। परिवार का मुखिया पूरे परिवार को कैसे लेकर के आता है, यह दर्द वही जानता है। जाड़े के दिन होते हैं। आलू बेच कर आया है कि गुड़ बेच कर आया है, धान बेच कर आया है, कि कर्ज लेकर आया है। मेला से वापस आया है। सब लोग नहा कर के अपनी जरूरत की चीजें खरीद कर चलते चले आ रहे हैं। साथ रहते हुए भी मुखिया अकेला दिखाई दे रहा है…)
केहू शाल, स्वेटर, दुशाला मोलावे
केहू बस अटैची के ताला मोलावे
केहू चायदानी पियाला मोलावे
सेठुउरा के केहू मसाला मोलावे
भावार्थ:- कोई साल-स्वेटर तो कोई अटैंची के ताले, कोई चायदानी, कप तो कोई सेठउरा के मशाले का मोलभाव कर रहा है।
नुमाइश में जा के बदल गइली भउजी
भईया से आगे निकल गइली भउजी
आयल हिंडोला मचल गइली भउजी
देखते डरामा उछल गइली भउजी
भावार्थ:- नुमाइश में पहुंचते ही भाभी जी बदल गईं और भईया से आगे निकल गईं। ड्रामा देखते ही उछल पड़ीं।
भईया बेचारू जोड़त हउवें खरचा,
भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरचा
बिहाने कचहरी, कचहरी के चिंता
बहिनिया के गौना मशहरी के चिंता
भावार्थ:- भईया बेचारे आने-जाने और मेले में खर्च हुए का हिसाब लगा रहे हैं, पकौड़ी का मर्चा है, कल कचहरी में भी खर्च है, बहन की बिदाई का समय है तो मशहरी देने की भी चिंता शामिल है।
फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता
खलीता में खाली किराया के बूता
तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें
गदोरी में सुरती मलत जात हउवें
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला
भावार्थ:- उनका कुर्ता फटा हुआ है, जूता टूटा हुआ है। जेब में सिर्फ किराये भर का पैसा बचा हुआ है, फिर भी हथेली पर तंबाकू मलते हुए पीछे-पीछे चले जा रहे हैं। यही है अमौसा का मेला।
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3 वर्ष पहले
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