आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विष्णु खरे की यादें: मिलीभगत और कायरता के बीच मुश्किल भरोसा यहां...

vishnu-khare
                
                                                         
                            हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि, पत्रकार और हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे का 19 सितंबर को निधन हो गया। श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत है उन्हीं के एक पुराने आलेख का अंश-  
                                                                 
                            

हिंदुस्तान-पाकिस्तान एक ही कौम की दो शाखें हैं, प्राचीन ईरान और 
आर्यावर्त्त की तरह, जिनके बीच रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। लाखों बेटियां 
बहुएं बनकर दोनों तरफ अनगिनत  खानदानों की जीनत बनी हुई हैं। क्या कोई उनके 
वापस जाने की मांग कर सकता है? दीन, जियारत, तहजीब, जुबान, अदब, खेल, 
तिजारत-ऐसा कोई इंसानी खित्ता नहीं है जिसमें दोनों अवामों की साझा आवाजाही 
न हो। ‘भारत-पाक भाई-भाई’ तक भी बात पहुंच जाती है। लेकिन अमृत के इस 
प्याले में हलाहल की एक बूंद भी घुली हुई है- दोस्ती अपनी जगह है, दुश्मनी 
अपनी जगह। शिया-सुन्नी दोनों मुसलमान हैं-कम-से-कम ‘काफिरून’ को तो यही 
मुगालता है- लेकिन सैकड़ों बरसों से एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। कुछ ऐसी 
ही कैफियत भारतीय हिंदू और पाकिस्तानी मुसलमान के बीच तारी कर दी गई है। 
दोनों के बीच जो सांप-सीढ़ी का खेल चल रहा है उसमें किसी भी खाने में गुंजलक 
मारे हुए अंधी वतनपरस्ती के अजदहे कभी इसको और कभी उसको, और कभी दोनों को, 
निगलकर वापस शुरुआत में उगल देते हैं। ग्लोबल सियासत के पांसे फिकते रहते हैं।

फिल्मों में जैसे-जैसे पैसा बढ़ता गया है...

लोग समझते हैं कि मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में अरबों रुपये लगे हुए हैं, 
ऐक्टरों की रसाई प्रधानमंत्री से लेकर बड़े-से-बड़े केंद्रीय और प्रांतीय 
अफसरों तक होती है तो उनका कौन बाल बांका कर सकता होगा। लेकिन अक्सर देखा 
गया है कि जो बहुत ताकतवर होता है उसकी एकाध नस बहुत कमजोर भी होती है। 
फिल्मवाले चाहते हैं कि उनकी पिक्चर निर्विघ्न बन जाए और आसानी से 
सिनेमाघरों में लग जाए-फिर दर्शक उसके साथ क्या सुलूक करते हैं यह किस्मत 
पर छोड़ दिया जाता है। लेकिन फिल्मों में जैसे-जैसे पैसा बढ़ता गया है, कई 
तरह के नए-नए जोखिम भी आते जा रहे हैं। यदि फिल्म बनानेवालों की दिलचस्पी 
राजनीति में बढ़ी है तो राजनीति भी सिनेमा पर और उसे बनानेवालों पर बहुत 
पैनी और लोलुप नजर रखे हुए है। इधर पिछले कुछ वर्षों में राजनीति फिल्मी 
दुनिया पर छाती गई है और कई अभिनेता खुल्लमखुल्ला इस या उस पार्टी के साथ 
हो चुके हैं। लोकसभा-राज्यसभा में पहले से कहीं अधिक ऐक्टर दिखाई देने लगे 
हैं। लेकिन उससे सिने-जगत को कोई सुरक्षा मिली हो ऐसा नहीं है, बल्कि 
इंडस्ट्री ही सत्ता-पक्ष विपक्ष में बंटती नजर आ रही है। दोनों खेमों के 
बीच वैमनस्य भी उफन कर सामने आ रहा है।
 
आगे पढ़ें

फिल्मों में जैसे-जैसे पैसा बढ़ता गया है...

7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर