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अदम: आख़िर पीनी तो शराब ही थी, यहां क्या और वहां क्या ?

urdu poet Abdul Hameed 'adam'
                
                                                         
                            
प्रसिद्ध शायर अब्दुल हमीद 'अदम' अपने जीवन में फक्कड़ और बेख़बरी के अालम के लिए जाने जाते हैं। प्रकाश पंडित ने अपनी किताब 'अदम और उनकी शायरी' में उनके जीवन से संंबं‌धित कई रोचक पहलुओं का वर्णन किया है। अदम जीवन का हर क्षण आनंद में जीना चाहते थे। उनकी जीवन के कुछ संस्मरण बहुत ही रोचक हैं। यहां पेश एक ऐसा ही वाक़या। 

किसी के सम्मान में अगर दावत दी जाती है तो उम्मीद रहती है कि मेहमान वक़्त से पहले आ जाएगा। लेकिन अब्दुल हमीद 'अदम' अपनी मर्ज़ी के मालिक थे और उनसे बहस करने की ग़ुस्ताखी के बारे में तो कोई ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था। हाज़िर जवाब जो इतने थे कि सवाल करने वाले को अपनी अक़्ल पर ही शक होने लगता। 

दरअसल हूआ यूं था कि 'अदम' के सम्मान में एक शाम दावत रखी गई थी और उन्हें वादे के मुताबिक़ महफ़िल में सात बजे पहुंचना था। लेकिन 'अदम' तो 'अदम' थे। दोस्त-अहबाब सब वक्त से पहुंच गए लेकिन उस दावत में एक अदम ही थे जिनकी कुछ ख़बर न थी। शराब के शौक़ीन तो वो इतने थे कि दुनिया जहान की सारी नेमतें उसके लिए लुटा दें। मगर उनके सम्मान में दी गई दावत में वह खुद ऐसा करेंगे किसी को भी गुमान भी न था। 

घड़ी की सुइयां चलती रहीं और 'अदम' का इंतज़ार होता रहा। सात से साढ़े सात, फिर आठ और यहां तक की नौ बज गए लेकिन जनाब मेहमान 'अदम' साहब ग़ायब हैं। शाम से रात हो गई उनके दोस्त-अहबाब उनको लेकर फ़िक्रमंद हैं, लेकिन अदम दावत में अपनी मेहमान नवाज़ी को लेकर बेफ़िक्र हैं। दावत ख़त्म होने ही वाली थी कि एक लड़ख़ड़ाता और ख़ुद को संभलाता एक शख़्स कमरे में दाख़िल होता है। सभी की सवाल करती निगाहें देखकर 'अदम' कहते हैं, 'आख़िर पीनी तो शराब ही थी। यहां क्या और वहां क्या ? मेरे कुछ दोस्त मिल गए थे और रास्ते में शराबख़ाना था।'

'अदम' की पूरी ज़िंदगी और शायरी शराबख़ाने के इर्द-गिर्द ही रही। 'अदम' अप्रैल 1910 में हुकुमते बरतानिया के पंजाब के तलवंडी मूसा में पैदा हुए थे। जो अब पाकिस्तान के पंजाब में है। वो काफ़ी लंबे अरसे तक आर्मी में रहे। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उनकी तैनाती मध्य पूर्व में ईरान और इराक़ में भी हुई। जहां उन्हें एक इराक़ी लड़की से मोहब्बत हो गई। पहले से शादी-शुदा 'अदम' इराक़ी लड़की से शादी कर उसे अपने साथ ले आए। हालांकि, उनकी अपनी दूसरी बीवी से हमेशा अनबन रही और दोनों के आए दिन झगड़े होते। इससे तंग आकर वो अदम को छोड़कर वापस इराक़ चली गई।

शराब की आदत पर अदम का कोई क़ाबू न था और शराबख़ाना उन्हें बेहद अज़ीज़ था। एक साथ शराब पीने की वजह से अदम की उस दौर के शायर अख़्तर शीरानी से बहुत जमती थी। दोनों शायर का पीकर खुद पर कोई बस न रहता। एक बार का वाक़या है कि अदम और 'अख़्तर' शीरानी बेतहाशा पिए हुए थे। ऐसे में दोनों की गुफ्तुगू कुछ यूं हुई:

अख़्तर: तुम नज़्म के बादशाह हो 'अदम' !
अदम : नहीं तुम नज़्म के बादशाह हो ।
अख़्तर: मैं कहता हूं तुम हो ।
अदम: अरे नहीं भई, तुम हो ।
अख़्तर : तो फिर तुम क्या हो ।
अदम: मैं ग़ज़ल का बादशाह हूं ।


अपने आप से लड़ता और अपने विचारों से टकराता शायर 'अदम' दुनिया से कहता है कि साक़ी मेरे ख़ुलूस की शिद्दत को देखना, फिर आ गया हूं गर्दिशे-दौरां को टालकर। जिस तरह अदम गर्दिशे-दौरां यानि कि संसार चक्र को टालकर फिर से आने की बात करते हैं उसमें उनकी ख़ुद्दारी साफ़ झलकती है। ख़ुद्दार और अपनी शर्तों पर जीने वाले शायर 'अदम' आखि़र इस दुनिया को 1981 में अलविदा कह गए। आंखों से पिलाने का इसरार करती अदम की एक ग़ज़ल।

आंखों से तिरी ज़ुल्फ़ का साया नहीं जाता 
आराम जो देखा है भुलाया नहीं जाता 

अल्लाह रे नादान जवानी की उमंगें
जैसे कोई बाज़ार सजाया नहीं जाता 

आंखों से पिलाते रहो साग़र में न डालो 
अब हम से कोई जाम उठाया नहीं जाता 

बोले कोई हंस कर तो छिड़क देते हैं जां भी 
लेकिन कोई रूठे तो मनाया नहीं जाता 

जिस तार को छेड़ें वही फ़रियाद-ब-लब है 
अब हम से 'अदम' साज़ बजाया नहीं जाता 

 
( क़िस्सा प्रकाश पंडित की किताब अदम और उनकी शायरी की भूमिका से) 
8 वर्ष पहले

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