अच्छा शेर पढ़े जाने पर आम तौर पर श्रोताओं में से वाह-वा, सुब्हान अल्लाह, मरहबा आदि का शोर बुलन्द होता है। मगर शायर अपने ही ढंग से दाद देते हैं। इस तरह की दाद की एक ख़याली तस्वीर यहां महसूस करें जिसे पं. दत्तात्रिय कैफ़ी ने खींचा है।
मानो इंशा अल्लाह ख़ान शेर पढ़ते हैं
कमर बांधे हुए चलने को यां सब यार बैठे हैं
बहुत आगे चले गए, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे है
अब इस पर शायर दाद देंगे तो कैसे देंगे
सौदा- क्या मतला कहा है?
मीर- लफ़्ज़ है कि तीरो-नश्तर
दर्द- सैयर इन्शा इसकी दाद है छाती कूटना
मुसहफ़ी- वाह क्या हमागीर तबीयत पाई है। क्या दर्दभरा मतला कहा है।
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