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वायरल कविता: बलराम बल्लू की कविता 'सच बतलाओ राम! तुम्हारी पहली दीवाली कैसी थी'

balram ballu viral kavita on ram sach batlao ram tumhari pahli diwali kaisi thi
                
                                                         
                            महाबलि रावण वध करके 
                                                                 
                            
पहली बार अवध जब आए 
राम तुम्हारे अभिनंदन में 
तरु, पुष्प, धरती हरषाए 

दीप माल जब अवध नगर के 
सभी भवन के द्वारों पर थी 
ख़ुशी अयोध्या-राम मिलन की 
आंखों में पानी भर भर थी 
तब विधवा मां के हाथों में 
स्वागत की थाली कैसी थी 
सच बतलाओ राम!
तुम्हारी पहली दीवाली कैसी थी 

माना कि तुम मानवता के 
मानवता से बड़े कथन हो 
और विधि से परे विधि को 
दिए गए तुम एक वचन हो 
किन्तु तुम पर तात शोक या 
जनता का उत्सव भारी था 
हे सहज राम! तब हिय तुम्हारा
अंदर से कितना भारी था

आंसू के दरवाजे तुमने 
कितने पहरेदार बिठाए 
और अयोध्या में जलते वो 
दीपक तुमको कितने भाए  

जिस दिन दशरथ हीन महल में 
तुमने विधवा मांएं देखीं 
उस दिन सूर्यवंश वाले उस
सूरज की लाली कैसी थी 
सच बतलाओ राम!
तुम्हारी पहली दीवाली कैसी थी 

माना तुमको मानव होकर 
मानवता का दुख हरना था 
शंखनाद को सहज बनाकर 
आंगन में कलरव करना था 
माना तुमने दशरथ के तब 
राजमुकुट का मान रखा था 
ख़ुद के सुख दुख से भी ज़्यादा 
अवध नगर का ध्यान रखा था
किन्तु कहो स्वीकार सहज 
सब चित्त तुम्हारा कर पाया था 
क्या बाहर का उत्सव 
अंदर का सूनापन भर पाया था 
जिस राजा के राजकुंवर हो 
कानों में बाली पहनी थी 
उस राजा के ना रहने पर 
कानों की बाली कैसी थी 
सच बतलाओ राम!
तुम्हारी पहली दीवाली कैसी थी 
 

 
1 सप्ताह पहले

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