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वो बचपन...

                
                                                         
                            आँख बंद कर ढूंढती हूँ ,
                                                                 
                            
मैं तो अब मेरा वो बचपन .
मेरी उन धुंधली यादों में
है खिला – खिला सा वो बचपन .
जी लेती हूँ उन यादों को ,
सोच -सोचकर मैं तो अब बस .
मेरी वो यादें है ताज़ा ,
जिनमें दिखता मेरा वो बचपन .
पेड़ की उस घनी छाव में ,
खेलती मेरी वो दुनिया .
सोचती हूँ उस दुनिया को ,
जहां खेलता मेरा वो बचपन .
अब तो सब कुछ बदल गया है ,
उन यादों का अब कुछ बचा नहीं .
रह गयी अब यादें वो बनकर,
जिनमे रहता मेरा वो बचपन


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
9 वर्ष पहले

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