गिरीश कर्नाड का कामकाज इतना विपुल और मानवीय अनुभवों से जुड़ा हुआ है कि आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें कई तरह से याद करती रहेंगी। वह एक अप्रतिम नाटककार, कुशल अभिनेता, कुशाग्र संस्कृतिकर्मी और अच्छे वक्ता थे। वह थियेटर और फिल्म की दुनिया में कई युवाओं के प्रेरणास्रोत थे। वह लिखते कन्नड़ में थे, पर अनुवादों के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर पहचाने, पढ़े गए।
बीती सदी के साठ के दशक में विजय तेंदुलकर, मोहन राकेश, बादल सरकार की जो पीढ़ी उभरी, वह उसके अभिन्न सदस्य थे। इन चारों ने भारतीय नाटकों और रंगमंच की दशा-दिशा बदली, और उसे ऐसी भूमि पर खड़ा किया, जो यथार्थ की थी, विमर्श की थी। और जो इतनी प्रयोगशील भी थी कि उसमें भारतीय समाज की कई तरह की ध्वनियां और छवियां देखीं-पढ़ी जा सकें। तुगलक, हयवदन, नागमंडल, अग्नि और बरखा जैसे उनके नाटकों ने राजनीतिक सत्ता, स्त्री-पुरुष संबंधों और मानवीय प्रवृत्तियों की जो पड़ताल की, वह रंगमंच पर कई तरह से निखरी और आधुनिक भारतीय रंगमंच को उनके इन नाटकों ने एक नई मंच-सज्जा और प्रस्तुति के नए विधि-विधान के लिए प्रेरित किया।
जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के तत्कालीन निदेशक इब्राहिम अल्काजी ने उनके नाटक तुगलक को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला ग्राउंड में प्रस्तुत किया, तो लगा कि इस नाटक के साथ इसी तरह की प्रस्तुति न्याय कर सकती थी। स्वयं अल्काजी ने तुगलक के अलावा धर्मवीर भारती के अंधा युग का मंचन एक और नई तरह के प्रदर्शन स्थल पुराना किला में किया। इन्हीं नाटकों के साथ ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, ओम शिवपुरी, मनोहर सिंह, सुधा शिवपुरी, उत्तरा बावकर, सुरेखा सीकरी आदि का क्रमशः थियेटर जगत में पदार्पण हुआ, चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं के लिए साहस और विश्वास जगा।
यही बात सुपरिचित कन्नड़ लेखक अनंतमूर्ति के उपन्यास संस्कार पर आधारित इसी नाम की फिल्म के बारे में भी कही जा सकती है। कन्नड़ में ही बनी इस फिल्म की प्रमुख भूमिका में गिरीश कर्नाड भी थे। इसने नए सिनेमा या समांतर सिनेमा की दुनिया में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। इसको कन्नड़ सिनेमा के इतिहास में इसलिए भी याद किया जाता है कि यह कन्नड़ की पहली फिल्म थी, जिसको राष्ट्रपति का गोल्डन लोटस पुरस्कार मिला।
पुरस्कारों और सम्मानों की कड़ियां बनती चली गईं। कन्नड़ साहित्य अकादमी, केंद्रीय साहित्य अकादेमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें प्राप्त हुए। और पिछले वर्ष ही अमर उजाला ने लाइफ अचीवमेंट अवार्ड से उनको सम्मानित किया। पद्म भूषण अलंकरण से वह अलंकृत हुए थे। सत्ता प्रतिष्ठानों से पुरस्कृत होने के बावजूद वह अपने विचारों और गतिविधियों में प्रतिरोधी स्वर के अगुआ बने रहे।
एकाधिक बार उन्होंने ऐसे विचार सामने रखे, जो राजनीतिक सत्ता को सुहाने वाले नहीं थे पर गिरीश कर्नाड एक लेखक और बुद्धिजीवी की अंतरात्मा की बात ही कहते और सुनते रहे। उनके इस वक्तव्य से भी खासा विवाद पैदा हुआ था कि रवींद्रनाथ बड़े कवि तो हैं, पर बड़े नाटककार नहीं। उन्होंने वी.एस नायपाल को भी उनकी भारत-दृष्टि के मामले में आड़े हाथों लिया था, पर गिरीश कर्नाड का कद कुछ ऐसा था कि उनकी विवादास्पद बातें भी ध्यान से सुनी गईं। यह निरा संयोग नहीं था कि कर्नाड ने जिन फिल्मों में काम किया, वे किसी न किसी विमर्श और प्रगतिकामी दृष्टि से जुड़ी हुई थीं। अगर संस्कार ब्राह्मणवादी व्यवस्था को प्रश्नांकित करती थी, तो श्याम बेनेगल की फिल्म मंथन एक सामाजिक क्रांति, और एक नए उद्यम की कथा कहती थी।
गिरीश कर्नाड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के लेखकीय और थियेटर जगत का प्रतिनिधि माना जाता था। प्रति वर्ष विश्व रंगमंच दिवस पर दुनिया भर में जो संदेश प्रसारित किया जाता है, और जिसे प्रत्येक वर्ष किसी देश का कोई प्रतिनिधि नाटककार या रंगकर्मी लिखता है, उसे भारत के प्रतिनिधि के रूप में बस एक बार गिरीश कर्नाड ने ही लिखा है।
वह केंद्रीय संगीत नाटक अकादेमी के अध्यक्ष रहे और अन्य कई सांस्कृतिक संस्थाओं में उनका महती योगदान रहा है। कर्नाड ने अपनी लेखकीय यात्रा 23 वर्ष की आयु में ययाति नाटक के साथ शुरू की थी। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह भी एक सुखद संयोग रहा कि अनुवादक के रूप में उन्हें ब.व. कारंथ जैसा रंगकर्मी मिला।
तुगलक का अनुवाद कारंथ जी का ही किया हुआ है। और स्वयं कारंथ जी हिंदी में हयवदन की प्रस्तुति के एक प्रमुख प्रयोगकर्ता रहे हैं। इसके लिए उन्होंने हिंदी के सुपरिचित कवियों-कुंवर नारायण और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से गीत लिखवाए, जो बहुत लोकप्रिय हुए थे। सत्तर के दशक के आरंभिक वर्षों में दिल्ली में हयवदन के मंचन ने हलचल मचाई थी।
कर्नाड से मैं स्वयं जितनी बार मिला, उनके गरिमामय और मानवीय व्यवहार से प्रभावित हुआ। एक बार हम एक विदेशी भूमि में एक साथ थे। सहसा कर्नाड ने मुझसे पूछा कि अब आप यहां से कहां जाएंगे। मैंने कहा, नॉर्वे। वहां मेरी छोटी बेटी रहती है। उन्होंने बेटी के कामकाज के बारे में पूछा, फिर कुछ गर्वित से स्वर में बोले, अंग्रेजी में जिसका आशय था, ओह, अब वे किस तरह दुनिया भर में फैल गए हैं। जब मैं संगीत नाटक अकादेमी की पत्रिका का संपादक बना, और उन्हें कुछ लिखने लिए आमंत्रित किया, तो जवाब सकारात्मक और उत्साहवर्धक ही आया।
हमारे रंग-जगत, फिल्म जगत को जो समृद्धि और गरिमा उन्होंने दी, उसे हम कितना भी याद करें, उसमें कितनी भी बातें और जुड़ती ही जाएंगी। उस प्रभावशाली व्यक्तित्व की जो छाप कन्नड़ और भारतीय साहित्य पर पड़ी है, स्वयं उस पर बहुत कुछ लिखा और कहा गया है।
उनका नाम आते ही, सबको उनके कामकाज की बहुत कुछ याद आएगी ही, किसी को उनकी किसी फिल्म की, किसी को उनके किसी नाटक की, किसी को उनके नाटक में किए गए किसी अभिनेता के अभिनय की। लेखकीय स्वतंत्रता के वह जबरदस्त हिमायती थे। और इस स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एकाधिक बार मोर्चों ओर जुलूसों में भी वह शामिल हुए थे। उनकी उपस्थिति निश्चय ही प्रेरक बनी रही है। उनकी स्मृति भी प्रेरक बनी रहेगी।
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7 वर्ष पहले
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