उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है;
वतन के फ़कीरों का फेरा हुआ है।
जगो, अब निराशा-निशा खो रही है;
सुनहली-सी पूरब दिशा हो रही है;
उषा की किरण कालिमा धो रही है,
न अब क़ौम कोई कहीं सो रही है;
तुम्हें किसलिए मोह घेरा हुआ है।
उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है।
जवानो! जगो, क़ौम की जान जागो,
पड़े किसलिए देश की शान जागो;
ग़ुलामी मिटे देश उत्थान जागो,
शहीदों की सच्ची सुसंतान जागो;
हटा दूर आलस-अँधेरा हुआ है।
उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है।
उठो देवियो! वक़्त खोने न देना,
कहीं फूट के बीज बोने न देना;
जगें जो, उन्हें फिर से सोने न देना
कभी राष्ट्र-अपमान होने न देना;
घड़ी शुभ महूरत का डेरा हुआ है।
उठो सोने वालो सबेरा हुआ है।
नई रोशनी मुल्क में उग रही है,
युगों बाद फिर हिंद-माँ जग रही है;
ख़ुमारी बचा प्राण को भग रही है,
दिलों में निराली लगन लग रही है:
मुसीबत से अब तो निबेरा हुआ है।
उठो सोने वालो सबेरा हुआ है।
हवा क्रांति की झूमती डाली-डाली,
बदल जाने वाली है शासन प्रणाली;
जगो, देख लो कैसी रौनक़-निराली,
सितारे गए, आ गया अंशुमाली;
घरों में, दिलों में उजेरा हुआ है।
उठो सोने वालो! सबेरा हुआ है।
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