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हादसा जो गुलज़ार के साथ हुआ उसका असर ताउम्र बना रहा

कच्ची उम्र में जो हादसे घट जाते हैं, उनका असर ताउम्र बना रहता है
                
                                                         
                            कहते हैं कच्ची उम्र में जो हादसे घट जाते हैं उनकी यादें भले धुंधली हो जाएं पर उनका असर ताउम्र बना रहता है। यह असर इतना गहरा होता है कि आपकी सोच और समझ को प्रभावित करता है और आपके निर्णय लेने की क्षमता को भी।
                                                                 
                            

ऐसा ही हादसा गुलज़ार के साथ हुआ। इससे अकेले गुलज़ार ही प्रभावित नहीं हुए, लाखों के लिए यह जिंदगी भर के लिए नासूर बन गया। हादसे का नाम था बंटवारा। गुलज़ार की रचनाओं में यह दर्द साफ़ दिखता है। 

गुलज़ार अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहते थे पर उनके बड़े भाई और पिता ने उन्हें पढ़ाने से इंकार कर दिया। विस्थापन के बाद पढ़ाई से भी दूर हो चुके गुलज़ार अपना आकाश तय करने के लिए मुंबई चले आए। मां-पिता से दूर गुलज़ार हमेशा इम्तिहान के दौर से गुजरते रहे। मुंबई आकर उन्होंने गैरेज में मेकेनिक का काम किया। दिल्ली में भी उन्होंने अभाव और ग़म की ज़िंदगी काटी। 

विस्थापन का दर्द गुलज़ार की इस नज़्म में देखने को मिलता है...

आदमी बुलबुला है पानी का 
और पानी की बहती सतह पर 
टूटता भी है डूबता भी है 
फिर उभरता है, फिर से बहता है 
न समुंदर निगल सका इस को 
न तवारीख़ तोड़ पाई है 
वक़्त की हथेली पर बहता 
आदमी बुलबुला है पानी का 
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एक वर्ष पहले

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