अक्सर मुझसे यह सवाल किया जाता है कि मैंने अपनी पहली कविता कब लिखी थी? कविता ने ठीक मेरे भीतर जन्म कब लिया था? मैं याद करने की कोशिश करता हूं। बचपन की बात है। उसी समय मैंने पढ़ना सीखा था। एक रोज मेरे भीतर भावनाओं ने हलचल मचाई और मैंने कागज पर कुछ शब्द लिख दिए। उनमें से कुछ लय और तुक में थे, लेकिन लिखने के बाद वे शब्द भी मुझे अजनबियों जैसे लग रहे थे। मैंने उन पंक्तियों को एक सादे कागज पर साफ-सुथरा लिख दिया। वह कविता मेरी मां के लिए थी- सौतेली मां के लिए। वह सौतेली थी, लेकिन फरिश्तों जैसी थी। उसकी नरम-मुलायम छांव में मेरे बचपन की निगहबानी हुई। मैंने पहली ही कविता लिखी थी और मेरे पास ऐसा कोई जरिया नहीं था, जिससे मैं यह जान सकूं कि मैंने आखिर लिखा क्या है। ऐसे में जाहिर है, कागज का वह टुकड़ा लेकर मैं अपने माता-पिता के पास गया।
वे डाइनिंग रूम में बैठे थे और फुसफुसाकर बातें कर रहे थे। जब भी माता-पिता फुसफुसाकर बातें करते थे, वे नदियों की तरह जमीन को दो हिस्सों में बांट देते थे। एक हिस्सा बड़ों के लिए और दूसरे पार का हिस्सा बच्चों के लिए। उनके सामने खड़ा मैं कविता के आकस्मिक स्पर्श से कांप रहा था। वह कागज मैंने उनकी ओर बढ़ा दिया। खोए-खोए से मेरे पिता ने आधे मन से वह कागज पकड़ा, आधे मन से उसे पढ़ा और आधे मन से ही मुझे वापस करते हुए कहा, 'कहां से नकल मारी है बेटा?' इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस, आवाज नीची करके जाने किन अहम मुद्दों पर मां से बातें करने लग गए। इस तरह मेरी पहली कविता ने जन्म लिया था, और इस तरह, पहली कविता के साथ ही मुझे गैरजिम्मेदार साहित्यिक आलोचना का एक नमूना भी तोहफे में मिला था।
-चिली के नोबेलजयी कवि
8 वर्ष पहले
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